Saturday, May 3, 2025

5>||*रामचरित मानस के कुछ रोचक तथ्य*🏹

5>||*रामचरित मानस के कुछ रोचक तथ्य*


1:~लंका में राम जी = 111 दिन रहे।

2:~लंका में सीताजी = 435 दिन रहीं।

3:~मानस में श्लोक संख्या = 27 है।

4:~मानस में चोपाई संख्या = 4608 है।

5:~मानस में दोहा संख्या = 1074 है।

6:~मानस में सोरठा संख्या = 207 है।

7:~मानस में छन्द संख्या = 86 है।


8:~सुग्रीव में बल था = 10000 हाथियों का।

9:~सीता रानी बनीं = 33वर्ष की उम्र में।

10:~मानस रचना के समय तुलसीदास की उम्र = 77 वर्ष थी।

11:~पुष्पक विमान की चाल = 400 मील/घण्टा थी।

12:~रामादल व रावण दल का युद्ध = 87 दिन चला।

13:~राम रावण युद्ध = 32 दिन चला।

14:~सेतु निर्माण = 5 दिन में हुआ।


15:~नलनील के पिता = विश्वकर्मा जी हैं।

16:~त्रिजटा के पिता = विभीषण हैं।


17:~विश्वामित्र राम को ले गए =10 दिन के लिए।

18:~राम ने रावण को सबसे पहले मारा था = 6 वर्ष की उम्र में।

19:~रावण को जिन्दा किया = सुखेन बेद ने नाभि में अमृत रखकर।


 *श्री राम के दादा परदादा का नाम क्या था?* 

 *नहीं तो जानिये-* 

1 - ब्रह्मा जी से मरीचि हुए,

2 - मरीचि के पुत्र कश्यप हुए,

3 - कश्यप के पुत्र विवस्वान थे,

4 - विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए.वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था,

5 - वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था, इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुलकी स्थापना की |

6 - इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए,

7 - कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था,

8 - विकुक्षि के पुत्र बाण हुए,

9 - बाण के पुत्र अनरण्य हुए,

10- अनरण्य से पृथु हुए,

11- पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ,

12- त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए,

13- धुन्धुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था,

14- युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए,

15- मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ,

16- सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित,

17- ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए,

18- भरत के पुत्र असित हुए,

19- असित के पुत्र सगर हुए,

20- सगर के पुत्र का नाम असमंज था,

21- असमंज के पुत्र अंशुमान हुए,

22- अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए,

23- दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए, भागीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतारा था.भागीरथ के पुत्र ककुत्स्थ थे |

24- ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए, रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया, तब से श्री राम के कुल को रघु कुल भी कहा जाता है |

25- रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए,

26- प्रवृद्ध के पुत्र शंखण थे,

27- शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए,

28- सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था,

29- अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग हुए,

30- शीघ्रग के पुत्र मरु हुए,

31- मरु के पुत्र प्रशुश्रुक थे,

32- प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए,

33- अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था,

34- नहुष के पुत्र ययाति हुए,

35- ययाति के पुत्र नाभाग हुए,

36- नाभाग के पुत्र का नाम अज था,

37- अज के पुत्र दशरथ हुए,

38- दशरथ के चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हुए |

इस प्रकार ब्रह्मा की उन्चालिसवी (39) पीढ़ी में श्रीराम का जन्म हुआ |

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*श्री राम के दादा परदादा का नाम क्या था?* 

শ্রী শ্রী রামচন্দ্রের বংশ পরিচয়----

1 - ब्रह्मा जी से मरीचि हुए,

2 - मरीचि के पुत्र कश्यप हुए,

3 - कश्यप के पुत्र विवस्वान थे,

4 - विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए.वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था,

5 - वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था, इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुलकी स्थापना की |

6 - इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए,

7 - कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था,

8 - विकुक्षि के पुत्र बाण हुए,

9 - बाण के पुत्र अनरण्य हुए,

10- अनरण्य से पृथु हुए,



 


Friday, May 2, 2025

4>|| রামজন্ম ভূমি মন্দিরের বিবরণ ||

   4>|| রামজন্ম ভূমি মন্দিরের বিবরণ ||

         

অযোধ্যা রাম মন্দির প্রাণ প্রতিষ্ঠা::--

হিন্দি पौष शुक्ल, द्वादशी,विक्रम संवत 2080

सोमवार ।

A.D year 2024 -- 22 january.Monday.

বাংলা  ৭ মাঘ ১৪৩০ সোমবার।

शुभ दिन  प्रभु श्रीराम के बाल रूप नूतन विग्रह को, श्रीराम जन्मभूमि पर बन रहे नवीन मंदिर भूतल के गर्भगृह में विराजित करके प्राण- प्रतिष्ठा की जायेगी।


|| ॐ श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर का वीवरण ||
1● मंदिर परम्परागत शैली में निर्मित।
2● मंदिर की लंबाई (पूर्व- पशिचम) 380 फिट
      चौड़ाई 250 फिट एवं ऊँचाई 161 फिट।
3●तीन मंजिला मंदिर, प्रत्येक मंजिल की  
     ऊंचाई 20 फिट, कुल 392 खम्बे, 44
     दरवाजे।
4●भूतल गर्भगृह- प्रभु श्रीराम के बाल रूप
     (श्री रामलला) का विग्रह, प्रथम  तल
      गर्भगृह-श्रीराम दरबार।
5●कुल पाँच मंडप=नृत्यमंडप, रंग मंडप,
   गुढ़ मंडप ( सभा मंडप),प्रर्थना मंडप,
    कीर्तन मंडप।
6●खम्बे, दीवार में देवी-देवता तथा देवांगनाओं
     की मूर्तियाँ।
7●प्रोवेश पूर्व से, 32 सीढ़ीयाँ ( ऊँचाई 16.5
     फिट) चड़कर सिंहद्वार से प्रवेश होगा।
8●दिव्यांगजन तथा बृद्धो के लिए रैम्प  एवं
      लिफ्ट की व्यवस्था।
9●चारों ओर आयताकार परकोटा(প্রাচীর)
     (प्रकार)-लम्बाई 732 मीटर/0.732
     kilomitar/2401.57 feet.
      चौड़ाई 4.25 मीटर /13.93 feet.
      परकोटा के चार कोनों पर चार मंदिर--
     भगवान सूर्य, शंकर, गणपति, देवी भगवरी,
     परकोटे की दक्षिणी भुजा में हनुमान एवं
     उत्तरी भुजा में अन्नपूर्णा माता का मंदिर।

10●मंदिर के समीप पौराणिक काल का
       सिताकुप।
11●श्री राम जन्मभूमि मंदिर परिसर में
       प्रस्तावित अन्य मंदिर--महर्षि वाल्मीकि,
      महर्षि वसिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि
     अगस्त्य, निषादराज गुह, माता शबरी,
      एवं देवी अहिल्या।
12●दक्षिणी--पश्चिमी भाग में नवरत्न कुबेर,
        टीले पर स्थित शिव मंदिर का
        जीणोंद्धार ( সংস্কার) एवं रामभक्त   
        जटायु राज  प्रतिमा की स्थापना।
           ( संग्रहित)
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Wednesday, April 13, 2016

3>रामचरितमानस संकट में भी मुक्त हो=Ram & ravan // काकभुशुण्डि कथा:-=//=शेषनाग के*===>( 1 to 4 )

3>রামায়ণ=Post=3***रामचरितमानस=***( 1 to 4 )

1>रामचरितमानस की  चौपाइयों के जप से  बड़े-से-बड़े संकट  में भी मुक्त हो जाता है।
2>Ram & ravan=रामेश्वरम में जब शिवलिंग=दक्षिणा
3>काकभुशुण्डि कथा:-*
4>शेषनाग के अवतार लक्ष्मण की धर्मपत्नी उर्मिला से जुड़े 8 अनसुनी बाते, जिनका 
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1>रामचरितमानस की  चौपाइयों के जप से बड़े-से-बड़े संकट में भी मुक्त हो जाता है।

रामचरितमानस की चौपाइयों में ऐसी क्षमता है कि इन चौपाइयों के जप से ही मनुष्य बड़े-से-बड़े संकट में भी
मुक्त हो जाता है। इन मंत्रो का जीवन में प्रयोग अवश्य करे प्रभु श्रीराम आप के जीवन को सुखमय बना देगे।
1. रक्षा के लिए
मामभिरक्षक रघुकुल नायक |  //  घृत वर चाप रुचिर कर सायक ||

2. विपत्ति दूर करने के लिए
राजिव नयन धरे धनु सायक |  //  भक्त विपत्ति भंजन सुखदायक ||


3. सहायता के लिए
मोरे हित हरि सम नहि कोऊ |  //  एहि अवसर सहाय सोई होऊ ||


4. सब काम बनाने के लिए
वंदौ बाल रुप सोई रामू |  //  सब सिधि सुलभ जपत जोहि नामू ||


5. वश मे करने के लिए
सुमिर पवन सुत पावन नामू |  //  अपने वश कर राखे राम ||


6. संकट से बचने के लिए
दीन दयालु विरद संभारी |  //  हरहु नाथ मम संकट भारी ||


7. विघ्न विनाश के लिए
सकल विघ्न व्यापहि नहि तेही |  //  राम सुकृपा बिलोकहि जेहि ||


8. रोग विनाश के लिए
राम कृपा नाशहि सव रोगा |  //  जो यहि भाँति बनहि संयोगा ||


9. ज्वार ताप दूर करने के लिए
दैहिक दैविक भोतिक तापा |  //  राम राज्य नहि काहुहि व्यापा ||


10. दुःख नाश के लिए
राम भक्ति मणि उस बस जाके |  //  दुःख लवलेस न सपनेहु ताके ||


11. खोई चीज पाने के लिए
गई बहोरि गरीब नेवाजू |  //  सरल सबल साहिब रघुराजू ||


12. अनुराग बढाने के लिए
सीता राम चरण रत मोरे |  //  अनुदिन बढे अनुग्रह तोरे ||


13. घर मे सुख लाने के लिए
जै सकाम नर सुनहि जे गावहि |  //  सुख सम्पत्ति नाना विधि पावहिं ||


14. सुधार करने के लिए
मोहि सुधारहि सोई सब भाँती |  //  जासु कृपा नहि कृपा अघाती ||


15. विद्या पाने के लिए
गुरू गृह पढन गए रघुराई |  //  अल्प काल विधा सब आई ||


16. सरस्वती निवास के लिए
जेहि पर कृपा करहि जन जानी |  //  कवि उर अजिर नचावहि बानी ||


17. निर्मल बुद्धि के लिए
ताके युग पदं कमल मनाऊँ |  //  जासु कृपा निर्मल मति पाऊँ ||


18. मोह नाश के लिए
होय विवेक मोह भ्रम भागा |  //  तब रघुनाथ चरण अनुरागा ||


19. प्रेम बढाने के लिए
सब नर करहिं परस्पर प्रीती |  //  चलत स्वधर्म कीरत श्रुति रीती ||


20. प्रीति बढाने के लिए
बैर न कर काह सन कोई |  //  जासन बैर प्रीति कर सोई ||


21. सुख प्रप्ति के लिए
अनुजन संयुत भोजन करही |  //  देखि सकल जननी सुख भरहीं ||


22. भाई का प्रेम पाने के लिए
सेवाहि सानुकूल सब भाई |  //  राम चरण रति अति अधिकाई ||


23. बैर दूर करने के लिए
बैर न कर काहू सन कोई |  //  राम प्रताप विषमता खोई ||


24. मेल कराने के लिए
गरल सुधा रिपु करही मिलाई |  //  गोपद सिंधु अनल सितलाई ||


25. शत्रु नाश के लिए
जाके सुमिरन ते रिपु नासा |  //  नाम शत्रुघ्न वेद प्रकाशा ||


26. रोजगार पाने के लिए
विश्व भरण पोषण करि जोई |  //  ताकर नाम भरत अस होई ||


27. इच्छा पूरी करने के लिए
राम सदा सेवक रूचि राखी |  //  वेद पुराण साधु सुर साखी ||


28. पाप विनाश के लिए
पापी जाकर नाम सुमिरहीं |  //  अति अपार भव भवसागर तरहीं ||


29. अल्प मृत्यु न होने के लिए
अल्प मृत्यु नहि कबजिहूँ पीरा |  //  सब सुन्दर सब निरूज शरीरा ||


30. दरिद्रता दूर के लिए
नहि दरिद्र कोऊ दुःखी न दीना |  //  नहि कोऊ अबुध न लक्षण हीना ||


31. प्रभु दर्शन पाने के लिए
अतिशय प्रीति देख रघुवीरा |  //  प्रकटे ह्रदय हरण भव पीरा ||


32. शोक दूर करने के लिए
नयन बन्त रघुपतहिं बिलोकी |  //  आए जन्म फल होहिं विशोकी ||


33. क्षमा माँगने के लिए
अनुचित बहुत कहहूँ अज्ञाता |  /  क्षमहुँ क्षमा मन्दिर दोऊ भ्राता ||

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2>Ram & ravan=रामेश्वरम में जब शिवलिंग=दक्षिणा

(भगवान श्री राम ने रामेश्वरम में जब शिवलिंग की स्थापना की तब आचार्यत्व के लिए रावण को निमंत्रित किया था। रावण ने उस निमंत्रण को स्वीकार किया और उस अनुष्ठान का आचार्य बना। रावण त्रिकालज्ञ था, उसे पता था कि उसकी मृत्यु सिर्फ श्रीराम के हाथों लिखी है। वह कुछ भी दक्षिणा माँग सकता था। पर उसने क्या विचित्र दक्षिणा माँगी वह इस लेख में पढ़िए।
>>> रावण केवल शिव भक्त, विद्वान एवं वीर ही नहीं, अति-मानववादी भी था..। उसे भविष्य का पता था..। वह जानता था कि श्रीराम से जीत पाना उसके लिए असंभव था..। जामवंत जी को आचार्यत्व का निमंत्रण देने के लिए लंका भेजा गया..। जामवन्त जी दीर्घाकार थे, वे आकार में कुम्भकर्ण से तनिक ही छोटे थे। लंका में प्रहरी भी हाथ जोड़कर मार्ग दिखा रहे थे। इस प्रकार जामवन्त को किसी से कुछ पूछना नहीं पड़ा।स्वयं रावण को उन्हें राजद्वार पर अभिवादन का उपक्रम करते देख जामवन्त ने मुस्कराते हुए कहा कि मैं अभिनंदन का पात्र नहीं हूँ। मैं वनवासी राम का दूत बनकर आया हूँ। उन्होंने तुम्हें सादर प्रणाम कहा है।
रावण ने सविनय कहा– आप हमारे पितामह के भाई हैं। इस नाते आप हमारे पूज्य हैं। आप कृपया आसन ग्रहण करें। यदि आप मेंरा निवेदन स्वीकार कर लेंगे, तभी संभवतः मैं भी आपका संदेश सावधानी से सुन सकूंगा।
जामवन्त ने कोई आपत्ति नहीं की। उन्होंने आसन ग्रहण किया। रावण ने भी अपना स्थान ग्रहण किया। तदुपरान्त जामवन्त ने पुनः सुनाया कि वनवासी राम ने सागर-सेतु निर्माण उपरांत अब यथाशीघ्र महेश्व-लिंग-विग्रह की स्थापना करना चाहते हैं। इस अनुष्ठान को सम्पन्न कराने के लिए उन्होने ब्राह्मण, वेदज्ञ और शैव रावण को आचर्य पद पर वरण करने की इच्छा प्रकट की है। मैं उनकी ओर से आपको आमंत्रित करने आया हूँ।
प्रणाम प्रतिक्रिया, अभिव्यक्ति उपरान्त रावण ने मुस्कान भरे स्वर में पूछ ही लिया कि क्या राम द्वारा महेश्व-लिंग-विग्रह स्थापना लंका-विजय की कामना से किया जा रहा है ?
बिल्कुल ठीक। श्रीराम की महेश्वर के चरणों में पूर्ण भक्ति है।
जीवन में प्रथम बार किसी ने रावण को ब्राह्मण माना है और आचार्य बनने योग्य जाना है। क्या रावण इतना अधिक मूर्ख कहलाना चाहेगा कि वह भारतवर्ष के प्रथम प्रशंसित महर्षि पुलस्त्य के सगे भाई महर्षि वशिष्ठ के यजमान का आमंत्रण और अपने आराध्य की स्थापना हेतु आचार्य पद अस्वीकार कर दिया। लेकिन हाँ। यह जाँच तो नितांत आवश्यक है ही कि जब वनवासी राम ने इतना बड़ा आचार्य पद पर पदस्थ होने हेतु आमंत्रित किया है तब वह भी यजमान पद हेतु उचित अधिकारी है भी अथवा नहीं।
जामवंत जी ! आप जानते ही हैं कि त्रिभुवन विजयी अपने इस शत्रु की लंकापुरी में आप पधारे हैं। यदि हम आपको यहाँ बंदी बना लें और आपको यहाँ से लौटने न दें तो आप क्या करेंगे ?
जामवंत खुलकर हँसे।
मुझे निरुद्ध करने की शक्ति समस्त लंका के दानवों के संयुक्त प्रयास में नहीं है, किन्तु मुझे किसी भी प्रकार की कोई विद्वत्ता प्रकट करने की न तो अनुमति है और न ही आवश्यकता। ध्यान रहे, मैं अभी एक ऐसे उपकरण के साथ यहां विद्यमान हूँ, जिसके माध्यम से धनुर्धारी लक्ष्मण यह दृश्यवार्ता स्पष्ट रूप से देख-सुन रहे हैं। जब मैं वहाँ से चलने लगा था तभी धनुर्वीर लक्ष्मण वीरासन में बैठे हुए हैं। उन्होंने आचमन करके अपने त्रोण से पाशुपतास्त्र निकाल कर संधान कर लिया है और मुझसे कहा है कि जामवन्त! रावण से कह देना कि यदि आप में से किसी ने भी मेरा विरोध प्रकट करने की चेष्टा की तो यह पाशुपतास्त्र समस्त दानव कुल के संहार का संकल्प लेकर तुरन्त छूट जाएगा। इस कारण भलाई इसी में है कि आप मुझे अविलम्ब वांछित प्रत्युत्तर के साथ सकुशल और आदर सहित धनुर्धर लक्ष्मण के दृष्टिपथ तक वापस पहुँचने की व्यवस्था करें।
उपस्थित दानवगण भयभीत हो गए। लंकेश तक काँप उठे। पाशुपतास्त्र ! महेश्वर का यह अमोघ अस्त्र तो सृष्टि में एक साथ दो धनुर्धर प्रयोग ही नहीं कर सकते। अब भले ही वह रावण मेघनाथ के त्रोण में भी हो। जब लक्ष्मण ने उसे संधान स्थिति में ला ही दिया है, तब स्वयं भगवान शिव भी अब उसे उठा नहीं सकते। उसका तो कोई प्रतिकार है ही नहीं।
रावण ने अपने आपको संभाल कर कहा – आप पधारें। यजमान उचित अधिकारी है। उसे अपने दूत को संरक्षण देना आता है। राम से कहिएगा कि मैंने उसका आचार्यत्व स्वीकार किया।
जामवन्त को विदा करने के तत्काल उपरान्त लंकेश ने सेवकों को आवश्यक सामग्री संग्रह करने हेतु आदेश दिया और स्वयं अशोक वाटिका पहुँचे, जो आवश्यक उपकरण यजमान उपलब्ध न कर सके जुटाना आचार्य का परम कर्त्तव्य होता है। रावण जानता है कि वनवासी राम के पास क्या है और क्या होना चाहिए।
अशोक उद्यान पहुँचते ही रावण ने सीता से कहा कि राम लंका विजय की कामना समुद्रतट पर महेश्वर लिंग विग्रह की स्थापना करने जा रहे हैं और रावण को आचार्य वरण किया है। यजमान का अनुष्ठान पूर्ण हो यह दायित्व आचार्य का भी होता है। तुम्हें विदित है कि अर्द्धांगिनी के बिना गृहस्थ के सभी अनुष्ठान अपूर्ण रहते हैं। विमान आ रहा है, उस पर बैठ जाना। ध्यान रहे कि तुम वहाँ भी रावण के अधीन ही रहोगी। अनुष्ठान समापन उपरान्त यहाँ आने के लिए विमान पर पुनः बैठ जाना। स्वामी का आचार्य अर्थात् स्वयं का आचार्य। यह जान जानकी जी ने दोनों हाथ जोड़कर मस्तक झुका दिया। स्वस्थ कण्ठ से सौभाग्यवती भव कहते रावण ने दोनों हाथ उठाकर भरपूर आशीर्वाद दिया।
सीता और अन्य आवश्यक उपकरण सहित रावण आकाश मार्ग से समुद्र तट पर उतरा। आदेश मिलने पर आना कहकर सीता को उसने विमान में ही छोड़ा और स्वयं राम के सम्मुख पहुँचा। जामवन्त से संदेश पाकर भाई, मित्र और सेना सहित श्रीराम स्वागत सत्कार हेतु पहले से ही तत्पर थे। सम्मुख होते ही वनवासी राम आचार्य दशग्रीव को हाथ जोड़कर प्रणाम किया। दीर्घायु भव ! लंका विजयी भव ! दशग्रीव के आशीर्वचन के शब्द ने सबको चौंका दिया । सुग्रीव ही नहीं विभीषण को भी उसने उपेक्षा कर दी। जैसे वे वहाँ हों ही नहीं।
भूमि शोधन के उपरान्त रावणाचार्य ने कहा कि यजमान ! अर्द्धांगिनी कहाँ है ? उन्हें यथास्थान आसन दें।
श्रीराम ने मस्तक झुकाते हुए हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्र स्वर से प्रार्थना की कि यदि यजमान असमर्थ हो तो योग्याचार्य सर्वोत्कृष्ट विकल्प के अभाव में अन्य समकक्ष विकल्प से भी तो अनुष्ठान सम्पादन कर सकते हैं।
अवश्य-अवश्य, किन्तु अन्य विकल्प के अभाव में ऐसा संभव है, प्रमुख विकल्प के अभाव में नहीं। यदि तुम अविवाहित, विधुर अथवा परित्यक्त होते तो संभव था। इन सबके अतिरिक्त तुम सन्यासी भी नहीं हो और पत्नीहीन वानप्रस्थ का भी तुमने व्रत नहीं लिया है। इन परिस्थितियों में पत्नीरहित अनुष्ठान तुम कैसे कर सकते हो ?
कोई उपाय आचार्य ?
आचार्य आवश्यक साधन, उपकरण अनुष्ठान उपरान्त वापस ले जाते हैं। स्वीकार हो तो किसी को भेज दो, सागर सन्निकट पुष्पक विमान में यजमान पत्नी विराजमान हैं।
श्रीराम ने हाथ जोड़कर मस्तक झुकाते हुए मौन भाव से इस सर्वश्रेष्ठ युक्ति को स्वीकार किया।
श्री रामादेश के परिपालन में विभीषण मंत्रियों सहित पुष्पक विमान तक गए और सीता सहित लौटे।
अर्द्ध यजमान के पार्श्व में बैठो अर्द्ध यजमान। आचार्य के इस आदेश का वैदेही ने पालन किया। गणपति पूजन, कलश स्थापना और नवग्रह पूजन उपरान्त आचार्य ने पूछा - लिंग विग्रह ?
यजमान ने निवेदन किया कि उसे लेने गत रात्रि के प्रथम प्रहर से पवनपुत्र कैलाश गए हुए हैं। अभी तक लौटे नहीं हैं। आते ही होंगे।
आचार्य ने आदेश दे दिया - विलम्ब नहीं किया जा सकता। उत्तम मुहूर्त उपस्थित है। इसलिए अविलम्ब यजमान-पत्नी बालुका-लिंग-विग्रह स्वयं बना ले।
जनक नंदिनी ने स्वयं के कर-कमलों से समुद्र तट की आर्द्र रेणुकाओं से आचार्य के निर्देशानुसार यथेष्ट लिंग-विग्रह निर्मित की।
यजमान द्वारा रेणुकाओं का आधार पीठ बनाया गया। श्रीसीताराम ने वही महेश्वर लिंग-विग्रह स्थापित किया। आचार्य ने परिपूर्ण विधि-विधान के साथ अनुष्ठान सम्पन्न कराया।
अब आती है बारी आचार्य की दक्षिणा की...... श्रीराम ने पूछा - आपकी दक्षिणा?
पुनः एक बार सभी को चौंकाया।
आचार्य के शब्दों ने। घबराओ नहीं यजमान। स्वर्णपुरी के स्वामी की दक्षिणा सम्पत्ति नहीं हो सकती। आचार्य जानते हैं कि उनका यजमान वर्तमान में वनवासी है, लेकिन फिर भी राम अपने आचार्य कि जो भी माँग हो उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा करता है।
आचार्य जब मृत्यु शैय्या ग्रहण करे तब यजमान सम्मुख उपस्थित रहे। आचार्य ने अपनी दक्षिणा मांगी।
ऐसा ही होगा आचार्य। यजमान ने वचन दिया और समय आने पर निभाया भी।
“रघुकुल रीति सदा चली आई । प्राण जाई पर वचन न जाई ।”
यह दृश्य वार्ता देख सुनकर सभी ने उपस्थित समस्त जन समुदाय के नयनाभिराम प्रेमाश्रुजल से भर गए। सभी ने एक साथ एक स्वर से सच्ची श्रद्धा के साथ इस अद्भुत आचार्य को प्रणाम किया ।
रावण जैसे भविष्यदृष्टा ने जो दक्षिणा माँगी, उससे बड़ी दक्षिणा क्या हो सकती थी? जो रावण यज्ञ-कार्य पूरा करने हेतु राम की बंदी पत्नी को शत्रु के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है, व राम से लौट जाने की दक्षिणा कैसे मांग सकता है?
बहुत कुछ हो सकता था। काश राम को वनवास न होता, काश सीता वन न जाती, किन्तु ये धरती तो है ही पाप भुगतने वालों के लिए और जो यहाँ आया है, उसे अपने पाप भुगतने होंगे और इसलिए रावण जैसा पापी लंका का स्वामी तो हो सकता है देवलोक का नहीं।
वह तपस्वी रावण जिसे मिला था-
ब्रह्मा से विद्वता और अमरता का वरदान
शिव भक्ति से पाया शक्ति का वरदान....
चारों वेदों का ज्ञाता,
ज्योतिष विद्या का पारंगत,
अपने घर की वास्तु शांति हेतु आचार्य रूप में जिसे, भगवन शंकर ने किया आमंत्रित..., शिव भक्त रावण, रामेश्वरम में शिवलिंग पूजा हेतु, अपने शत्रु प्रभु राम का, जिसने स्वीकार किया निमंत्रण। आयुर्वेद, रसायन और कई प्रकार की
जानता जो विधियां, अस्त्र शास्त्र, तंत्र-मन्त्र की सिद्धियाँ..। शिव तांडव स्तोत्र का महान कवि, अग्नि-बाण ब्रह्मास्त्र का ही नहि, बेला या वायलिन का आविष्कर्ता, जिसे देखते ही दरबार में राम भक्त हनुमान भी एक बार मुग्ध हो, बोल उठे थे -
"राक्षस राजश्य सर्व लक्षणयुक्ता"....
काश रामानुज लक्ष्मण ने सुर्पणखा की नाक न कटी होती, काश रावण के मन में सुर्पणखा के प्रति अगाध प्रेम न होता, गर बदला लेने के लिए सुर्पणखा ने रावण को न उकसाया होता, रावण के मन में सीता हरण का ख्याल कभी न आया होता...।
इस तरह रावण में, अधर्म बलवान न होता, तो देव लोक का भी स्वामी रावण ही होता..।

(रामेश्वरम् देवस्थान में लिखा हुआ है कि इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना श्रीराम ने रावण द्वारा करवाई थी। बाल्मीकि रामायण और तुलसीकतृ रामायण में इस कथा का वर्णन नहीं है, पर तमिल भाषा में लिखी महर्षि कम्बन की 'इरामावतारम्' मे यह कथा है।)
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3>काकभुशुण्डि कथा:-*


काकभुशुण्डि रामचरितमानस के एक पात्र हैं। संत तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में लिखा है कि काकभुशुण्डि परमज्ञानी रामभक्त हैं। रावण के पुत्र मेघनाथ ने राम से युद्ध करते हुये राम को नागपाश से बाँध दिया था। देवर्षि नारद के कहने पर गरूड़, जो कि सर्पभक्षी थे, ने नागपाश के समस्त नागों को खाकर राम को नागपाश के बंधन से छुड़ाया। राम के इस तरह नागपाश में बँध जाने पर राम के परमब्रह्म होने पर गरुड़ को सन्देह हो गया। गरुड़ का सन्देह दूर करने के लिये देवर्षि नारद उन्हें ब्रह्मा जी के पास भेजा। ब्रह्मा जी ने उनसे कहा कि तुम्हारा सन्देह भगवान शंकर दूर कर सकते हैं। भगवान शंकर ने भी गरुड़ को उनका सन्देह मिटाने के लिये काकभुशुण्डि जी के पास भेज दिया। अन्त में काकभुशुण्डि जी राम के चरित्र की पवित्र कथा सुना कर गरुड़ के सन्देह को दूर किया। गरुड़ के सन्देह समाप्त हो जाने के पश्चात् काकभुशुण्डि जी गरुड़ को स्वयं की कथा सुनाया जो इस प्रकार हैः

पूर्व के एक कल्प में कलियुग का समय चल रहा था। उसी समय काकभुशुण्डि जी का प्रथम जन्म अयोध्या पुरी में एक शूद्र के घर में हुआ। उस जन्म में वे भगवान शिव के भक्त थे किन्तु अभिमानपूर्वक अन्य देवताओं की निन्दा करते थे। एक बार अयोध्या में अकाल पड़ जाने पर वे उज्जैन चले गये। वहाँ वे एक दयालु ब्राह्मण की सेवा करते हुये उन्हीं के साथ रहने लगे। वे ब्राह्मण भगवान शंकर के बहुत बड़े भक्त थे किन्तु भगवान विष्णु की निन्दा कभी नहीं करते थे। उन्होंने उस शूद्र को शिव जी का मन्त्र दिया। मन्त्र पाकर उसका अभिमान और भी बढ़ गया। वह अन्य द्विजों से ईर्ष्या और भगवान विष्णु से द्रोह करने लगा। उसके इस व्यवहार से उनके गुरु (वे ब्राह्मण) अत्यन्त दुःखी होकर उसे श्री राम की भक्ति का उपदेश दिया करते थे।

एक बार उस शूद्र ने भगवान शंकर के मन्दिर में अपने गुरु, अर्थात् जिस ब्राह्मण के साथ वह रहता था, का अपमान कर दिया। इस पर भगवान शंकर ने आकाशवाणी करके उसे शाप दे दिया कि रे पापी! तूने गुरु का निरादर किया है इसलिये तू सर्प की अधम योनि में चला जा और सर्प योनि के बाद तुझे 1000 बार अनेक योनि में जन्म लेना पड़े। गुरु बड़े दयालु थे इसलिये उन्होंने शिव जी की स्तुति करके अपने शिष्य के लिये क्षमा प्रार्थना की। गुरु के द्वारा क्षमा याचना करने पर भगवान शंकर ने आकाशवाणी करके कहा, "हे ब्राह्मण! मेरा शाप व्यर्थ नहीं जायेगा। इस शूद्र को 1000 बार जन्म अवश्य ही लेना पड़ेगा किन्तु जन्मने और मरने में जो दुःसह दुःख होता है वह इसे नहीं होगा और किसी भी जन्म में इसका ज्ञान नहीं मिटेगा। इसे अपने प्रत्येक जन्म का स्मरण बना रहेगा जगत् में इसे कुछ भी दुर्लभ न होगा और इसकी सर्वत्र अबाध गति होगी मेरी कृपा से इसे भगवान श्री राम के चरणों के प्रति भक्ति भी प्राप्त होगी।"

इसके पश्चात् उस शूद्र ने विन्ध्याचल में जाकर सर्प योनि प्राप्त किया। कुछ काल बीतने पर उसने उस शरीर को बिना किसी कष्ट के त्याग दिया वह जो भी शरीर धारण करता था उसे बिना कष्ट के सुखपूर्वक त्याग देता था, जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र को त्याग कर नया वस्त्र पहन लेता है। प्रत्येक जन्म की याद उसे बनी रहती थी। श्री रामचन्द्र जी के प्रति भक्ति भी उसमें उत्पन्न हो गई। अन्तिम शरीर उसने ब्राह्मण का पाया। ब्राह्मण हो जाने पर ज्ञानप्राप्ति के लिये वह लोमश ऋषि के पास गया। जब लोमश ऋषि उसे ज्ञान देते थे तो वह उनसे अनेक प्रकार के तर्क-कुतर्क करता था। उसके इस व्यवहार से कुपित होकर लोमश ऋषि ने उसे शाप दे दिया कि जा तू चाण्डाल पक्षी (कौआ) हो जा। वह तत्काल कौआ बनकर उड़ गया। शाप देने के पश्चात् लोमश ऋषि को अपने इस शाप पर पश्चाताप हुआ और उन्होंने उस कौए को वापस बुला कर राममन्त्र दिया तथा इच्छा मृत्यु का वरदान भी दिया। कौए का शरीर पाने के बाद ही राममन्त्र मिलने के कारण उस शरीर से उन्हें प्रेम हो गया और वे कौए के रूप में ही रहने लगे तथा काकभुशुण्डि के नाम से विख्यात हुये।
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4>शेषनाग के अवतार लक्ष्मण की धर्मपत्नी उर्मिला से जुड़े 8 अनसुनी बाते, जिनका

हम बचपन से ही रामायण की कथा सुनते आये है, अभी तक हम रामायण की कथा प्रभु राम के दृष्टिकोण से देखते, सुनते एवं पढ़ते आये है. रामायण की कथा में हमने भगवान राम के प्रति लक्ष्मण का आदर एवं त्याग देखा, माता सीता का पतिव्रता तथा निश्छल प्रेम देखा, हनुमान जी की अटूट भक्ति देखि तथा लंका नरेश रावण के ज्ञान के बारे में जाना.

परन्तु हमने कभी भूल से भी इस ओर ध्यान ही नहीं दिया की बगैर किसी अपराध के 14 वर्ष तक अपने से पति से दूर रहना का कष्ट सहती आई तथा रामायण का उपेक्षित एवं अनदेखा पात्र कहलाने वाली थी लक्ष्मण की पत्नी तथा माता सीता की छोटी बहन उर्मिला.

जब भगवान श्री राम अपनी पत्नी सीता के साथ वनवास को जा रहे थे तब उनके अनुज लक्ष्मण के बड़े आग्रह पर उन्हें भी प्रभु श्री राम के साथ वनवास जाने की आज्ञा मिली.

उर्मिला ने जब अपने पति लक्ष्मण के भगवान राम और माता सीता के साथ वनवास जाने की सुचना सुनी तो वो भी लक्ष्मण से उनके साथ वनवास जाने की जिद करने लगी.
तब लक्ष्मण ने उर्मिला को बहुत समझाया तथा कहा की हे! प्रिये इस राज्य तथा माताओ को तुम्हारी आवश्यकता है.

असीम पतिव्रता थी उर्मिला :-

अपनी धर्म पत्नी उर्मिला के कंधो पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी डालकर लक्ष्मण वन को चले गये, वो पल, जीवन सारिता जो कोई नवविवाहित पत्नी अपने पति के साथ व्यतीत करती है वह सब कुछ उर्मिला से छिन्न गया था.पतिव्रतापत्नी ने अपने जीवन के चंचल पड़ाव में भी, अपने पति से दूर होने के बावजूद लेशमात्र भी किसी अन्य का ध्यान तक नहीं किया.

यह उर्मिला के अखण्ड पतिव्रता होने का सबूत था फिर भी उर्मिला की यह महानता अवर्णित, अचर्चित तथा अघोषित ही रही. उर्मिला के पतिव्रता , स्नेह, अखंडता, त्याग आदि के गुणों का रामायण की कथा में कोई भी जिक्र नहीं हुआ है.

उर्मिला ने हर हाल में निभाया अपने पति को दिया वचन :-


कठिन से कठिन एवं जटिल परिस्थितियों में भी उर्मिला ने आंसू की एक बून्द तक अपने आँखों में नहीं आने दी क्योकि उन्होंने अपने पति लक्ष्मण को वनवास जाते समय यह वरदान दिया था की वह रोयेंगी नहीं. क्योकि अगर वो अपने दुखो में डूबी रहती तो परिवार का ध्यान कौन रखता.

दशरथ के मृत्यु के समय भी नहीं रोइ थी उर्मिला :-

यह कितना कष्टकारी पल होता है एक नवविवाहित स्त्री के लिए की अपने विवाह के बाद ही अपने पति को अपने से दूर भेजना . कितना हृदयविदारक पल था वो जब अपने परम पूज्य ससुर जी के अर्थात राजा दशरथ की मृत्यु को अपने आँखो के सामने देखना तथा उसके बाद भी अपने पति को दिए वचन के कारण उर्मिला आंसू न बहा पाई.

पति के लिए किया पिता को इंकार :-

पति लक्ष्मण के वनवास जाने तथा राजा दशरथ के गुजर जाने के बाद एक बार राजा जनक अपनी पुत्री उर्मिला को मिथला लेने के लिये आये थे. ताकि माता व अपनी सखियो के साथ रहकर वह अपने दुखो को भूल सके परन्तु उर्मिला ने अपने पिता से मिथला जाने के लिए यह कहते हुए मना कर दिया की अपने पति के परिजनों के संग में रहना तथा दुःख की इस घडी में उनका साथ न छोड़ना अब यही उसका धर्म है.

चौदह वर्षो तक न सोना :-

चौदह वर्षों तक सोती रहीं बहुत से लोग इस बात से परिचित हैं कि अपने वनवास के दौरान भाई और भाभी की सेवा करने के लिए लक्ष्मण पूरे 14 साल तक नहीं सोए थे. उनके स्थान पर उनकी पत्नी उर्मिला दिन और रात सोती रहीं. लेकिन यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि रावण की बेटे मेघनाद को यह वरदान प्राप्त था कि जो इंसान 14 वर्षों तक ना सोया हो केवल वही उसे हरा सकता है.

निद्रा देवी को दिया था वचन :-

इसलिए लक्ष्मण मेघनाद को मोक्ष दिलवाने में कामयाब हुए थे. रावण के अंत और 14 वर्ष के वनवास के पश्चात जब राम, सीता और लक्ष्मण वापस अयोध्या लौटे तब वहां राम के राजतिलक के समय लक्ष्मण जोर-जोर से हंसने लगे. सभी को ये बात बेहद आश्चर्यजनक लगी कि क्या लक्ष्मण किसी का मजाक उड़ा रहे है.

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Sunday, February 21, 2016

2> राम राम दो बार+रामकावंशपरिचय+रामकी बहन+लक्ष्मण के त्याग +क्या हैं "भगवान राम"===>( 1 to 8 )

2>রামায়ণ=Post=2***राम राम " दो बार क्यों***( 1 to 8 )

1>----------------- " राम राम " दो बार क्यों ?
2>-------------------"राम" का वंश परिचय
3>---------------- भगवान राम की बहन
4>-------------------लक्ष्मण जी के त्याग की अदभुत कथा जिज्ञासा÷
5>-------------------क्या हैं "भगवान राम"..??
6>-------------------जब श्रीरामचन्द्र जी को कुत्ते ने बताया न्याय का अनोखा तरीका

7>-------------क्यों कर लिया सीताजी ने हनुमानजी की बातों पर विश्वास?

8>-----------रावण का होगा सर्वनाश, त्रिजटा ने कर दी थी भविष्यवाणी क्योंकि....



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1> " राम राम " दो बार क्यों ?

क्या कभी सोचा है कि बहुत से लोग जब एक दूसरे से मिलते हैं तो आपस में एक दूसरे को दो बार ही “राम राम" क्यों बोलते हैं ? एक बार या तीन बार क्यों नही बोलते ? दो बार “राम राम" बोलने के पीछे बड़ा गूढ़ रहस्य है क्योंकि यह आदि काल से ही चला आ रहा है.हिन्दी की शब्दावली में ‘र' सत्ताइस्व्वां शब्द है, ‘आ’ की मात्रा दूसरा और ‘म' पच्चीसवां शब्द है. अब तीनो अंको का योग करें तो 27 + 2 + 25 = 54, अर्थात एक “राम” का योग 54 हुआ. इसी प्रकार दो “राम राम” का कुल योग 108 होगा।  हम जब कोई जाप करते हैं तो 108 मनके की माला गिनकर करते हैं।

सिर्फ 'राम राम' कह देने से ही पूरी माला का जाप हो जाता है।

2>"राम" का वंश परिचय
     BKS: कभी सोचा है की प्रभु श्री राम के दादा परदादा का नाम क्या था?
नहीं तो जानिये-
1 - ब्रह्मा जी से मरीचि हुए,----------- 2 - मरीचि के पुत्र कश्यप हुए,-- 3 - कश्यप के पुत्र विवस्वान थे,
4 - विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए.वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था,
5 - वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था, इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और 
     इस प्रकार इक्ष्वाकु कुलकी स्थापना की | - - - - - - - - -- -  -  -  - 6 - इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए,
7 - कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था-------   -- - --  --  -  --  - - - - --8 - विकुक्षि के पुत्र बाण हुए, 
9 - बाण के पुत्र अनरण्य हुए,-- -  -  -  -  -  -  -   - -- - - - - -  - - - 10- अनरण्य से पृथु हुए,                                           
11- पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ,--- - - - - - - - - - - - - - - - - -- - -12- त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए,
13- धुन्धुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था,--- - - - - - - - - - - - - - - -14- युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए,
15- मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ,--- - - - - - - - - - - - -- - -- -16- सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित,
17- ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए,-- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -18- भरत के पुत्र असित हुए,
19- असित के पुत्र सगर हुए,--- - - - - - - - - - - - - - - - - - - -- - -20- सगर के पुत्र का नाम असमंज था,
21- असमंज के पुत्र अंशुमान हुए,-- - - - - - - - - - - - - - - - - - --22- अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए,
23- दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए, भागीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतारा था.भागीरथ के पुत्र ककुत्स्थ थे |
24- ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए, रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम
     रघुवंश हो गया, तब से श्री राम के कुल को रघु कुल भी कहा जाता है |
25- रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए,-- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -26- प्रवृद्ध के पुत्र शंखण थे,
27- शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए,-- - - - - - - - - - - - - - - - - - - -- 28- सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था,
29- अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग हुए,-- - - - - - - - - - - - - - - - - - - --30- शीघ्रग के पुत्र मरु हुए,
31- मरु के पुत्र प्रशुश्रुक थे,-- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -32- प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए,
33- अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था,--- - - - - - - - - - - - - - --34- नहुष के पुत्र ययाति हुए,
35- ययाति के पुत्र नाभाग हुए,- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - ---36- नाभाग के पुत्र का नाम अज था,
37- अज के पुत्र दशरथ हुए,
38- दशरथ के चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हुए |
इस प्रकार ब्रह्मा की उन्चालिसवी --- - - - - - - - - - - - - - - - - - -(39) पीढ़ी में श्रीराम का जन्म हुआ |     ..
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3> भगवान राम की बहन
 🌷धर्म आध्यात्म और ज्योतिष ग्रुप🌷

🙏मित्रों आज आपको भगवान राम की बहन के बारे में जानकारी देते है🙏

🙏शांता🙏
कौन थीं भगवान राम की बहन, जानिए दक्षिण में वाल्मीकि रामायण, कंबन रामायण और रामचरित मानस, अद्भुत रामायण, अध्यात्म रामायण और आनंद रामायण की चर्चा ज्यादा होती है। उक्त रामायण का अध्ययन करने पर हमें रामकथा से जुड़े कई नए तथ्यों की जानकारी मिलती है। इसी तरह अगर दक्षिण की रामायण की मानें तो भगवान राम की एक बहन भी थीं, जो उनसे बड़ी थी। अब तक आप सिर्फ यही जानते आए हैं कि राम के तीन भाई लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न थे, लेकिन राम की बहन के बारे में कम लोग ही जानते हैं। बहुत दुखभरी कथा है राम की बहन की।

आओ जानते हैं कि राम की यह बहन कौन थीं। इसका नाम क्या था और यह कहां रहती थी। दक्षिण भारत की रामायण के अनुसार राम की बहन का नाम शांता था, जो चारों भाइयों से बड़ी थीं। शांता राजा दशरथ और कौशल्या की पुत्री थीं, लेकिन पैदा होने के कुछ वर्षों के बाद ही अंगदेश के राजा रोमपद ने निःशंतान होने के कारण राजा दशरथ से उनकी बेटी शांता को दत्तक पुत्री के रूप में गोद ले लिया था | भगवान राम की बड़ी बहन का पालन-पोषण राजा रोमपद और उनकी पत्नी वर्षिणी ने किया, जो महारानी कौशल्या की बहन अर्थात राम की मौसी थीं। इस संबंध में तीन कथाएं हैं।

1.पहली : वर्षिणी नि:संतान थीं तथा एक बार अयोध्या में उन्हों ने हंसी-हंसी में ही बच्चे की मांग की। दशरथ भी मान गए। रघुकुल का दिया गया वचन निभाने के लिए शांता अंगदेश की राजकुमारी बन गईं। शांता वेद, कला तथा शिल्प में पारंगत थीं और वे अत्यधिक सुंदर भी थीं।

2.दूसरी : लोककथा अनुसार शांता जब पैदा हुई, तब अयोध्या में अकाल पड़ा और 12 वर्षों तक धरती धूल-धूल हो गई। चिंतित राजा को सलाह दी गई कि उनकी पुत्री शांता ही अकाल का कारण है। राजा दशरथ ने अकाल दूर करने के लिए अपनी पुत्री शांता को वर्षिणी को दान कर दिया। उसके बाद शांता कभी अयोध्या नहीं आई। कहते हैं कि दशरथ उसे अयोध्या बुलाने से डरते थे इसलिए कि कहींफिर से अकाल नहीं पड़ जाए।

3.तीसरी कथा : कुछ लोग मानते थे कि राजा दशरथ ने शांता को सिर्फ इसलिए गोद दे दिया था, क्योंकि वह लड़की होने की वजह से उनकी उत्तराधिकारी नहीं बन सकती थीं।

शांता का विवाह महर्षि विभाण्डक के पुत्र ऋंग ऋषि से हुआ। एक दिन जब विभाण्डक नदी में स्नान कर रहे थे, तब नदी में ही उनका वीर्यपात हो गया। उस जल को एक हिरणी ने पी लिया था जिसके फलस्वरूप ऋंग ऋषि का जन्म हुआ था।एक बार एक ब्राह्मण अपने क्षेत्र में फसल की पैदावार के लिए मदद करने के लिए राजा रोमपद के पास गया, तो राजा ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। अपने भक्त की बेइज्जती पर गुस्साए इंद्रदेव ने बारिश नहीं होने दी, जिस वजह से सूखा पड़ गया। तब राजा ने ऋंग ऋषि को यज्ञ करने के लिए बुलाया। यज्ञ के बाद भारी वर्षा हुई। जनता इतनी खुश हुई कि अंगदेश में जश्न का माहौल बन गया। तभी वर्षिणी और रोमपद ने अपनी गोद ली हुई बेटी शांता का हाथ ऋंग ऋषि को देने का फैसला किया।

राजा दशरथ और इनकी तीनों रानियां इस बात को लेकर चिंतित रहती थीं कि पुत्र नहीं होने पर उत्तराधिकारी कौन होगा। इनकी चिंता दूर करने के लिए ऋषि वशिष्ठ सलाह देते हैं कि आप अपने दामाद ऋंग ऋषि से पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाएं। इससे पुत्र की प्राप्ति होगी। दशरथ ने उनके मंत्री सुमंत की सलाह पर पुत्र कामेष्ठि यज्ञ में महान ऋषियों को बुलाया। इस यज्ञ में दशरथ ने ऋंग ऋषि को भी बुलाया। ऋंग ऋषि एक पुण्य आत्मा थे तथा जहां वे पांव रखते थे वहां यश होता था। सुमंत ने ऋंग को मुख्य ऋत्विक बनने के लिए कहा। दशरथ ने आयोजन करने का आदेश दिया।षपहले तो ऋंग ऋषि ने यज्ञ करने से इंकार किया लेकिन बाद में शांता के कहने पर ही ऋंग ऋषि राजा दशरथ के लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ करने के लिए तैयार हुए थे। लेकिन...दशरथ ने केवल ऋंग ऋषि (उनके दामाद) को ही आमंत्रित किया लेकिन ऋंग ऋषि ने कहा कि मैं अकेला नहीं आ सकता। मेरी पत्नी शांता को भी आना पड़ेगा। ऋंग ऋषि की यह बात जानकर राजा दशरथ विचार में पड़ गए, क्योंकि उनके मन में अभी तक दहशत थी कि कहीं शांता के अयोध्या में आने से फिर से अकाल नहीं पड़ जाए। लेकिन जब पुत्र की कामना से पुत्र कामेष्ठि यज्ञ के दौरान उन्होंने अपने दामाद ऋंग ऋषि को बुलाया, तो दामाद ने शांता के बिना आने से इंकार कर दिया। तब पुत्र कामना में आतुर दशरथ ने संदेश भिजवाया कि शांता भी आ जाए। शांता तथा ऋंग ऋषि अयोध्या पहुंचे। शांता के पहुंचते ही अयोध्या में वर्षा होने लगी और फूल बरसने लगे। शांता ने दशरथ के चरण स्पर्श किए। दशरथ ने आश्चर्यचकित होकर पूछा कि 'हे देवी, आप कौन हैं? आपके पांव रखते ही चारों ओर वसंत छा गया है।' जब माता-पिता (दशरथ और कौशल्या) विस्मित थे कि वो कौन है? तब शांता ने बताया कि 'वो उनकी पुत्री शांता है।' दशरथ और कौशल्या यह जानकर अधिक प्रसन्न हुए। वर्षों बाद दोनों ने अपनी बेटी को देखा था।दशरथ ने दोनों को ससम्मान आसन दिया और उन दोनों की पूजा-आरती की। तब ऋंग ऋषि ने पुत्रकामेष्ठि यज्ञ किया तथा इसी से भगवान राम तथा शांता के अन्य भाइयों का जन्म हुआ ।कहते हैं कि पुत्रेष्ठि यज्ञ कराने वाले का जीवनभर का पुण्य इस यज्ञ की आहुति में नष्ट हो जाता है। इस पुण्य के बदले ही राजा दशरथ को पुत्रों की प्राप्ति हुई। राजा दशरथ ने ऋंग ऋषि को यज्ञ करवाने के बदले बहुत-सा धन दिया जिससे ऋंग ऋषि के पुत्र और कन्या का भरण-पोषण हुआ और यज्ञ से प्राप्त खीर से राम, लक्ष्मण,भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ। ऋंग ऋषि फिर से पुण्य अर्जित करने के लिए वन में जाकर तपस्या करने लगे। रामायण और रामचरित मानस में शांता के चित्र क्यों नहीं…जनता के समक्ष शान्ता ने कभी भी किसी को नहीं पता चलने दिया कि वो राजा दशरथ और कौशल्या की पुत्री हैं। यही कारण है कि रामायण या रामचरित मानस में उनका खास उल्लेख नहीं मिलता है। ऐसा माना जाता है।



4>  लक्ष्मण जी के त्याग की अदभुत कथा जिज्ञासा÷  

लक्ष्मण जी के त्याग की अदभुत कथा जिज्ञासा÷। एक अनजाने सत्य से परिचय---
-हनुमानजी की रामभक्ति की गाथा संसार में भर में गाई जाती है।
लक्ष्मणजी की भक्ति भी अद्भुत थी. लक्ष्मणजी की कथा के बिना श्री रामकथा पूर्ण नहीं है अगस्त्य मुनि अयोध्या आए और लंका युद्ध का प्रसंग छिड़ गया -


भगवान श्रीराम ने बताया कि उन्होंने कैसे रावण और कुंभकर्ण जैसे प्रचंड वीरों का वध किया और लक्ष्मण ने भी इंद्रजीत और अतिकाय जैसे शक्तिशाली असुरों को मारा॥
अगस्त्य मुनि बोले-
श्रीराम बेशक रावण और कुंभकर्ण प्रचंड वीर थे, लेकिन सबसे बड़ा वीर तो मेघनाध ही था ॥ उसने अंतरिक्ष में स्थित होकर इंद्र से युद्ध किया था और बांधकर लंका ले आया था॥
ब्रह्मा ने इंद्रजीत से दान के रूप में इंद्र को मांगा तब इंद्र मुक्त हुए थे ॥
लक्ष्मण ने उसका वध किया इसलिए वे सबसे बड़े योद्धा हुए ॥
श्रीराम को आश्चर्य हुआ लेकिन भाई की वीरता की प्रशंसा से वह खुश थे॥
फिर भी उनके मन में जिज्ञासा पैदा हुई कि आखिर अगस्त्य मुनि ऐसा क्यों कह रहे हैं कि इंद्रजीत का वध रावण से ज्यादा मुश्किल था ॥
अगस्त्य मुनि ने कहा- प्रभु इंद्रजीत को वरदान था कि उसका वध वही कर सकता था जो
💥 चौदह वर्षों तक न सोया हो,
💥 जिसने चौदह साल तक किसी स्त्री का मुख न देखा हो और
💥 चौदह साल तक भोजन न किया हो ॥
श्रीराम बोले- परंतु मैं बनवास काल में चौदह वर्षों तक नियमित रूप से लक्ष्मण के हिस्से का फल-फूल देता रहा ॥
मैं सीता के साथ एक कुटी में रहता था, बगल की कुटी में लक्ष्मण थे, फिर सीता का मुख भी न देखा हो, और चौदह वर्षों तक सोए न हों, ऐसा कैसे संभव है ॥
अगस्त्य मुनि सारी बात समझकर मुस्कुराए॥ प्रभु से कुछ छुपा है भला!
दरअसल, सभी लोग सिर्फ श्रीराम का गुणगान करते थे लेकिन प्रभु चाहते थे कि लक्ष्मण के तप और वीरता की चर्चा भी अयोध्या के घर-घर में हो ॥
अगस्त्य मुनि ने कहा - क्यों न लक्ष्मणजी से पूछा जाए ॥
लक्ष्मणजी आए प्रभु ने कहा कि आपसे जो पूछा जाए उसे सच-
सच कहिएगा॥
प्रभु ने पूछा- हम तीनों चौदह वर्षों तक साथ रहे फिर तुमने सीता का मुख कैसे नहीं देखा ?
फल दिए गए फिर भी अनाहारी कैसे रहे ?
और 14 साल तक सोए नहीं ?
यह कैसे हुआ ?
लक्ष्मणजी ने बताया- भैया जब हम भाभी को तलाशते ऋष्यमूक पर्वत गए तो सुग्रीव ने हमें उनके आभूषण दिखाकर पहचानने को कहा ॥
आपको स्मरण होगा मैं तो सिवाए उनके पैरों के नुपूर के कोई आभूषण नहीं पहचान पाया था क्योंकि मैंने कभी भी उनके चरणों के ऊपर देखा ही नहीं.
चौदह वर्ष नहीं सोने के बारे में सुनिए - आप औऱ माता एक कुटिया में सोते थे. मैं रातभर बाहर धनुष पर बाण चढ़ाए पहरेदारी में खड़ा रहता था. निद्रा ने मेरी आंखों पर कब्जा करने की कोशिश की तो मैंने निद्रा को अपने बाणों से बेध दिया था॥
निद्रा ने हारकर स्वीकार किया कि वह चौदह साल तक मुझे स्पर्श नहीं करेगी लेकिन जब श्रीराम का अयोध्या में राज्याभिषेक हो रहा होगा और मैं उनके पीछे सेवक की तरह छत्र लिए खड़ा रहूंगा तब वह मुझे घेरेगी ॥ आपको याद होगा
राज्याभिषेक के समय मेरे हाथ से छत्र गिर गया था.
अब मैं 14 साल तक अनाहारी कैसे रहा! मैं जो फल-फूल लाता था आप उसके तीन भाग करते थे. एक भाग देकर आप मुझसे कहते थे लक्ष्मण फल रख लो॥ आपने कभी फल खाने को नहीं कहा- फिर बिना आपकी आज्ञा के मैं उसे खाता कैसे?
मैंने उन्हें संभाल कर रख दिया॥
सभी फल उसी कुटिया में अभी भी रखे होंगे ॥ प्रभु के आदेश पर लक्ष्मणजी चित्रकूट की कुटिया में से वे सारे फलों की टोकरी लेकर आए और दरबार में रख दिया॥ फलों की
गिनती हुई, सात दिन के हिस्से के फल नहीं थे॥
प्रभु ने कहा-
इसका अर्थ है कि तुमने सात दिन तो आहार लिया था?
लक्ष्मणजी ने सात फल कम होने के बारे बताया- उन सात दिनों में फल आए ही नहीं,
1. जिस दिन हमें पिताश्री के स्वर्गवासी होने की सूचना मिली, हम निराहारी रहे॥
2. जिस दिन रावण ने माता का हरण किया उस दिन फल लाने कौन जाता॥
3. जिस दिन समुद्र की साधना कर आप उससे राह मांग रहे थे,
4. जिस दिन आप इंद्रजीत के नागपाश में बंधकर दिनभर अचेत रहे,
5. जिस दिन इंद्रजीत ने मायावी सीता को काटा था और हम शोक में
रहे,
6. जिस दिन रावण ने मुझे शक्ति मारी
7. और जिस दिन आपने रावण-वध किया ॥
इन दिनों में हमें भोजन की सुध कहां थी॥ विश्वामित्र मुनि से मैंने एक अतिरिक्त विद्या का ज्ञान लिया था- बिना आहार किए जीने की विद्या. उसके प्रयोग से मैं चौदह साल तक अपनी भूख को नियंत्रित कर सका जिससे इंद्रजीत मारा गया ॥
भगवान श्रीराम ने लक्ष्मणजी की तपस्या के बारे में सुनकर उन्हें ह्रदय से लगा लिया.

5>   क्या हैं "भगवान राम"..??

रावण सीता को समझा समझा कर हार गया था पर सीता ने रावण की तरफ एक बार देखा तक नहीं,
तब मंदोदरी ने उपाय बताया कि आप #राम बन के सीता के पास जाओ वो आपको जरूर देखेगी..
रावण ने कहा - मैं ऐसा कई बार कर चुका हूँ
मंदोदरी - तब क्या सीता ने आपकी ओर देखा?
रावण - मैं खुद सीता को नहीं देख सका  "क्योंकि मैं जब-जब राम बनता हूँ मुझे परायी
नारी अपनी #माता और  अपनी #पुत्री सी दिखती है।"
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6>जब श्रीरामचन्द्र जी को कुत्ते ने बताया न्याय का अनोखा तरीका

Shri Ram and a Dog Hindi Story from Ramayan : श्रीरामचन्द्र जी वनवास के बाद अयोध्या लौटे तो खूब धूम-धाम से उनका राजतिलक हुआ। बड़े सम्मान के साथ उन्हें अयोध्या का राजा बनाया गया। राज गद्दी पर बैठने के बाद उन्होंने लक्ष्मण जी को आदेश दिया हुआ था कि भोजन करने से पहले देखो हमारे द्वार पर कोई भूखा तो नहीं है।एक दिन की बात है लक्ष्मण जी ने श्रीरामचन्द्र जी से कहा,’ मैं अभी आवाज लगाकर आया हूं, कोई भी भूखा नहीं है।’


श्रीरामचन्द्र जी ने कहा, ‘ दोबारा जाओ और जोर से आवाज लगाओ शायद कोई भूखा रह गया हो। ‘

श्रीरामचन्द्र जी का आदेश पालन करते हुए लक्ष्मण जी दोबारा बाहर गए और उन्होंने जोर से आवाज लगाई तो कोई आदमी तो नहीं वरन् एक कुत्ते को लक्ष्मण जी ने रोते हुए देखा। अन्दर आ कर उन्होंने श्रीरामचन्द्र जी से कहा, ‘बाहर कोई व्यक्ति भूखा नहीं है बल्कि एक कुत्ता अवश्य रो रहा है। ‘

श्रीरामचन्द्र जी ने उस कुत्ते को अंदर बुलाया और कुत्ते से पूछा, ‘ तुम रो क्यों रहे हो ? ‘

कुत्ते ने कहा, ‘एक ब्राह्मण ने मुझे डंडा मारा है।’

श्रीरामचन्द्र जी ने ब्राह्मण को बुलवाया और उससे पूछा, ‘क्या यह कुत्ता सही बोल रहा है? ‘

ब्राह्मण ने कहा, ‘हां यह मेरे रास्ते में सो रहा था इसलिए मैंने इसे डंडा मारा है। यह कुत्ते जहां-तहां लेट जाते हैं, इन्हें डंडे से ही मारना चाहिए।

श्रीरामचन्द्र जी समझ गए कि ब्राह्मण की ही गलती है परंतु ब्राह्मण को क्या कहें सो उन्होंने कुत्ते को पूछा, ‘ब्राह्मण ने तुम्हें डंडा मारा तो तुम क्या चाहते हो? ‘

कुत्ते ने कहा,’भगवान इसे मठाधीश बना दिया जाए।’

कुत्ते की बात सुनकर भगवान मुस्करा दिए और मुस्कराते हुए कुत्ते से पूछा,’ इस ब्राह्मण ने तुम्हें डंडा मारा बदले में तुम इन्हें मठाधीश बनाना चाहते हो। मठाधीश बनने से इनकी बहुत सेवा होगी, काफी चेले बन जाएंगे। इससे तुम्हारा क्या फायदा होगा।’

कुत्ता बोला, मैं भी मठाधीश था। मुझ से कुछ गलत काम हुआ आज मैं कुत्ते की योनि में हूं और लोगों के डंडे खा रहा हूं। ये भी मठाधीश बनेगा फिर कुत्ते की योनि में जाएगा, फिर लोगों के डंडे खाएगा तो इसकी सजा पूरी हो जाएगी।

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7>क्यों कर लिया सीताजी ने हनुमानजी की बातों पर विश्वास?


रामायण में अब तक आपने पढ़ा...यह सुनकर वे सभी राक्षसियां डर गई और जानकी के चरणों में गिर पड़ी। इसके बाद वे सब जहां तहां चली गई। सीताजी मन में सोचने लगी एक महीना बीतने के बाद यह नीच रावण मुझे मारेगा। सीताजी हाथ जोड़कर त्रिजटा से बोली तू मेरी विपत्ति की साथी है। जल्दी कोई ऐसा उपाय कर जिससे मैं शरीर छोड़ सकूं। अब यह सब नहीं सहा जाता अब आगे....
सीताजी के वचन सुनकर त्रिजटा ने चरण पकड़कर उन्हें समझाया। उसके बाद त्रिजटा वहां से चली गई। सीताजी को व्याकुल देखकर हनुमानजी ने अपने मन ही मन कुछ विचार किया और अंगूठी सीताजी के सामने डाल दी। अंगूठी को पहचानकर सीताजी को आश्चर्यचकित होकर उसे देखने लगी। उन्हें कौन जीत सकता है? और माया से ऐसी अंगूठी बनाई जा सकती है। जैसे कई सवाल सीताजी के मन में घूमने लगे। तभी पेड़ पर बैठे हनुमानजी कथा सुनाने लगे। सीताजी मन में अनेक तक प्रकार के विचार कर रही थी। सीताजी का दुख भाग गया।
वे कान और मन लगाकर उन्हें सुनने लगी। हनुमानजी ने सारी कथा कह सुनाई। माता सीता बोली कौन है वो? जिसने कानों के लिए अमृतरूप सुंदर कथा कही, तब हनुमानजी पास चले गए उन्हें देखकर सीताजी मुंह फेरकर बैठ गई। श्रीरामजी का दूत हूं। रामजी की सच्ची कसम खाता हूं। मुझे श्रीरामजी ने यह अंगूठी पहचान के लिए दी है। हनुमानजी की पूरी बात सुनकर सीताजी के मन में विश्वास हो गया कि हनुमानजी श्रीरामजी के ही दूत हैं। यह अंगूठी मैं ही लाया हूं।
सीताजी ने पूछा नर और वानर का संग कहो कैसे हुआ? तब हनुमानजी ने जैसे संग हुआ वह सब कथा सुनाई। हनुमानजी की बात सुनकर सीताजी के मन में विश्वास हो गया। भगवान का सेवक जानकर हनुमानजी से उन्हें अत्यंत गाढ़ी प्रीति हो गई। तब सीताजी ने कहा अब छोटे भाई लक्ष्मणसहित रामजी की कुशल सुनाओ। हनुमान ने कहा अब धीरज धरकर रघुनाथजी का संदेश सुनिए। हनुमानजी ने सीताजी को रामजी का संदेश सुनाया। जब सीताजी के मन में पूरी तरह विश्वास हो गया तो हनुमानजी फिर छोटा रूप धारण कर लिया।

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8>रावण का होगा सर्वनाश, त्रिजटा ने कर दी थी भविष्यवाणी क्योंकि....

 रामायण में अब तक आपने पढ़ा....रावण वहां आया। उस दुष्ट ने सीताजी को बहुत प्रकार से समझाया। उसने कहा मैं मंदोदरी आदि सभी रानियों को तुम्हारी दासी बना दूंगा, यह मेरा प्रण है। तुम एक बार मेरी ओर देखो तो सही! तब सीताजी ने तिनके की आड़ करके कहने लगी। अरे दुष्ट तू समझ ले! तुझे रघुवीर के बाण की खबर नहीं है, यह सुनकर रावण सीताजी को मारने दौड़ा। तब मंदोदरी ने नीति कहकर उसे समझाया अब आगे....
रावण बोला अगर महीनेभर में तुमने कहा न माना तो मैं इस तलवार से तुम्हे मार डालूंगा। उसके बाद रावण वहां से चला गया। राक्षसियों का समूह बहुत से बुरे रूप धरकर सीताजी को भय दिखलाने लगे। उनमें एक त्रिजटा नाम की राक्षसी थी। उसने सब को बुलाकर अपना स्वप्र सुनाया। उसने सभी से कहा तुम सीताजी की सेवा करके अपना कल्याण कर लो। सपने में मैंने देखा एक बंदर ने लंका जला दी। राक्षसों की सारी सेना मार डाली। रावण नंगा है, गधे पर सवार है।
उसका सिर मुड़ा है, बीसों भुजाएं कटी हुई हैं। इस तरह वह दक्षिण दिशा को जा रहा है व लंका का राजा विभीषण बन गया है। मैं कह सकती हूं कि यह स्वप्न सत्य होकर रहेगा। यह सुनकर वे सभी राक्षसियां डर गई और जानकी के चरणों में गिर पड़ी। इसके बाद वे सब जहां तहां चली गई। सीताजी मन में सोचने लगी एक महीना बीतने के बाद यह नीच रावण मुझे मारेगा। सीताजी हाथ जोड़कर त्रिजटा से बोली तू मेरी विपत्ति की साथी है। जल्दी कोई ऐसा उपाय कर जिससे मैं शरीर छोड़ सकूं। अब यह सब नहीं सहा जाता।
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Saturday, February 20, 2016

1>रामायण के 7प्त काण्ड (1--7)

1>রামায়ণ=Post=1***रामायण के 7प्त काण्ड***( 1 to 7 )

1>------------------रामायण के 7प्त काण्ड मानव की सात सोपान
2>------------------- सुंदरताणड का 5 अहम बाते
3>------------------ दशहरे---- रावण ---- वध
4>------------------ श्री रामायण कथा
5>-------------------विचित्र दक्षिणा ----( Ram &Ravan )=भगवान श्री राम ने 
                               में जब शिवलिंग की स्थापना की
6>----------------अध्यात्म रामायण की एक कथा

7>--------------- तिनके का रहस्य !



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1>रामायण के 7प्त काण्ड मानव की सात सोपान
रामायण के सात काण्ड मानव की उन्नति के

सात सोपान <

1 बालकाण्ड -

     बालक प्रभु को प्रिय है क्योकि उसमेँ छल , कपट , नही होता ।

     विद्या , धन एवं प्रतिष्ठा बढने पर भी जो अपना हृदय निर्दोष निर्विकारी बनाये रखता है , उसी को भगवान
     प्राप्त होते है। बालक जैसा निर्दोष निर्विकारी दृष्टि रखने पर ही राम के स्वरुपको पहचान सकते है।
    जीवन मेँ सरलता का आगमन संयम एवं ब्रह्मचर्य से होता है ।बालक की भाँति अपने- मान अपमान को
    भूलने से जीवन मेँ सरलता आती है । बालक के समान निर्मोही एवं निर्विकारी बनने पर शरीर अयोध्या
    बनेगा । जहाँ युद्ध, वैर ,ईर्ष्या नहीँ है , वही अयोध्या है ।

2. अयोध्याकाण्ड -

यह काण्ड मनुष्य को निर्विकार बनाता है। जब जीव भक्ति रुपी सरयू नदी के तट पर हमेशा निवास करता है,तभी मनुष्य निर्विकारी बनता है।
भक्ति अर्थात् प्रेम ,अयोध्याकाण्ड प्रेम प्रदान करता है । राम का भरत प्रेम , राम का सौतेली माता से प्रेम
आदि ,सब इसी काण्ड मेँ है। राम की निर्विकारिता इसी मेँ दिखाई देती है ।
अयोध्याकाण्ड का पाठ करने से परिवार मेँ प्रेम बढता है ।उसके घर मेँ लडाई झगडे नहीँ होते ।
उसका घर अयोध्या बनता है ।कलह का मूल कारण धन एवं प्रतिष्ठा है । अयोध्याकाण्ड का फल निर्वैरता है ।सबसे पहले अपने घर की ही सभी प्राणियोँ मेँ भगवद् भाव रखना चाहिए।

3. अरण्यकाण्ड -

यह निर्वासन प्रदान करता है ।इसका मनन करने से वासना नष्ट होगी । बिना अरण्यवास(जंगल) के जीवन मेँ दिव्यता नहीँ आती । रामचन्द्र राजा होकर भी सीता के साथ वनवास किया ।वनवास मनुष्य हृदय को कोमल बनाता है।
तप द्वारा ही काम रुपी रावण का बध होगा । इसमेँ सूपर्णखा(मोह )एवं शबरी (भक्ति)दोनो ही है।भगवान राम सन्देश देते हैँ कि मोह को त्यागकर भक्ति को अपनाओ ।

4. किष्किन्धाकाण्ड -

जब मनुष्य निर्विकार एवं निर्वैर होगा तभी जीव की ईश्वर से मैत्री होगी ।इसमे सुग्रीव और राम अर्थात् जीव और ईश्वर की मैत्री का वर्णन है।जब जीव सुग्रीव की भाँति हनुमान अर्थात् ब्रह्मचर्य का आश्रय लेगा तभी उसे राम मिलेँगे। जिसका कण्ठ सुन्दर है वही सुग्रीव है।कण्ठ की शोभा आभूषण से नही बल्कि राम नाम का जप करने से है। जिसका कण्ठ  सुन्दर है , उसी की मित्रता राम से होती है किन्तु उसे हनुमान यानी ब्रह्मचर्य की सहायता लेनी पडेगी ।

5. सुन्दरकाण्ड -

जब जीव की मैत्री राम से हो जाती है तो वह सुन्दर हो जाता है ।इस काण्ड मेँ हनुमान को सीता के दर्शन होते है।

सीताजी पराभक्ति है , जिसका जीवन सुन्दर होता है उसे ही पराभक्ति के दर्शन होते है ।संसार समुद्र पार करने वाले को पराभक्ति सीता के दर्शन होते है ।ब्रह्मचर्य एवं रामनाम का आश्रय लेने वाला संसार सागर को पार करता है ।संसार सागर को पार करते समय मार्ग मेँ सुरसा बाधा डालने आ जाती है , अच्छे रस ही सुरसा है , नये नये रस की वासना रखने वाली जीभ ही सुरसा है। संसार सागर पार करने की कामना रखने वाले को जीभ को वश मे रखना होगा । जहाँ पराभक्ति  सीता है वहाँ शोक नही रहता , जहाँ सीता है वहाँ अशोकवन है।

6. लंकाकाण्ड -

जीवन भक्तिपूर्ण होने पर राक्षसो का संहार होता है काम क्रोधादि ही राक्षस हैँ । जो इन्हेँ मार सकता है ,वही कालको भी मार सकता है । जिसे काम मारता है उसे काल भी मारता है , लंका शब्द के अक्षरो को इधर उधर करने पर होगा कालं ।
काल सभी को मारता है किन्तु हनुमान जी काल को भी मार देते हैँ । क्योँकि वे ब्रह्मचर्य का पालन करते हैँ पराभक्ति का दर्शन करते है ।

7. उत्तरकाण्ड -

इस काण्ड मेँ काकभुसुण्डि एवं गरुड संवाद को बार बार पढना चाहिए । इसमेँ सब कुछ है ।जब तक राक्षस , काल का विनाश नहीँ होगा तब तक उत्तरकाण्ड मे प्रवेश नही मिलेगा ।इसमेँ भक्ति की कथा है । भक्त कौन है ? जो भगवान से एक क्षण भी अलग नही हो सकता वही भक्त है । पूर्वार्ध मे जो काम रुपी रावण को मारता है उसी का उत्तरकाण्ड सुन्दर बनता है ,वृद्धावस्था मे राज्य करता है । जब जीवन के पूर्वार्ध मे युवावस्था मे काम को मारने का प्रयत्न होगा  तभी उत्तरार्ध - उत्तरकाण्ड सुधर पायेगा । अतः जीवन को सुधारने का प्रयत्न युवावस्था से ही करना चाहिए ।
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2> सुंदरताणड का 5 अहम बाते

: सुंदरकाणड सें जुङी 5 अहम बातें जो कोई नहीं जानता !

1 :- सुंदरकाणड का नाम सुंदरकाणड क्यों रखा गया ?

हनुमानजी, सीताजी
की खोज में लंका गए थें और लंका त्रिकुटाचल पर्वत पर बसी हुई थी ! त्रिकुटाचल पर्वत यानी यहां 3 पर्वत थें ! पहला सुबैल पर्वत, जहां कें मैदान में युद्ध हुआ था !
दुसरा नील पर्वत, जहां राक्षसों कें महल बसें हुए थें ! और तीसरे पर्वत का नाम है सुंदर पर्वत, जहां अशोक वाटिका नीर्मित थी ! इसी वाटिका में हनुमानजी और सीताजी की भेंट हुई थी !
इस काण्ड की यहीं सबसें प्रमुख घटना थी , इसलिए इसका नाम सुंदरकाणड रखा गया है !

2 :- शुभ अवसरों पर ही सुंदरकाणड का पाठ क्यों ?

शुभ अवसरों पर गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस कें सुंदरकाणड का पाठ किया जाता हैं ! शुभ कार्यों की शुरूआत सें पहलें सुंदरकाणड का पाठ करनें का विशेष महत्व माना गया है !
जबकि किसी व्यक्ति कें जीवन में ज्यादा परेशानीयाँ हो , कोई काम नहीं बन पा रहा हैं, आत्मविश्वास की कमी हो या कोई और समस्या हो , सुंदरकाणड कें पाठ सें शुभ फल प्राप्त होने लग जाते है, कई ज्योतिषी या संत भी विपरित परिस्थितियों में सुंदरकाणड करनें की सलाह देते हैं !

3 :- जानिए सुंदरकाणड का पाठ विषेश रूप सें क्यों किया जाता हैं ?

माना जाता हैं कि सुंदरकाणड कें पाठ सें हनुमानजी प्रशन्न होतें है !
सुंदरकाणड कें पाठ में बजरंगबली की कृपा बहुत ही जल्द प्राप्त हो जाती हैं !
जो लोग नियमित रूप सें सुंदरकाणड का पाठ करतें हैं , उनके सभी दुख दुर हो जातें हैं , इस काण्ड में हनुमानजी नें अपनी बुद्धि और बल सें सीता की खोज की हैं !
इसी वजह सें सुंदरकाणड को हनुमानजी की सफलता के लिए याद किया जाता हैं !

4 :- सुंदरकाणड सें मिलता हैं मनोवैज्ञानिक लाभ ?

वास्तव में श्रीरामचरितमानस कें सुंदरकाणड की कथा सबसे अलग हैं , संपूर्ण श्रीरामचरितमानस भगवान श्रीराम कें गुणों और उनके पुरूषार्थ को दर्शाती हैं , सुंदरकाणड ऐक मात्र ऐसा अध्याय हैं जो श्रीराम कें भक्त हनुमान की विजय का काण्ड हैं !
मनोवैज्ञानिक नजरिए सें देखा जाए तो यह आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति बढ़ाने वाला काण्ड हैं , सुंदरकाणड कें पाठ सें व्यक्ति को मानसिक शक्ति प्राप्त होती हैं , किसी भी कार्य को पुर्ण करनें कें लिए आत्मविश्वास मिलता हैं !

5 :- सुंदरकाणड सें मिलता है धार्मिक लाभ ?

सुंदरकाणड कें लाम सें मिलता हैं धार्मिक लाभ हनुमानजी की पूजा सभी मनोकामनाओं को पुर्ण करनें वालीं मानी गई हैं , बजरंगबली बहुत जल्दी प्रशन्न होने वालें देवता हैं , शास्त्रों में इनकी कृपा पाने के कई उपाय बताएं गए हैं , इन्हीं उपायों में सें ऐक उपाय सुंदरकाणड का पाठ करना हैं , सुंदरकाणड कें पाठ सें हनुमानजी कें साथ ही श्रीराम की भी विषेश कृपा प्राप्त होती हैं !
किसी भी प्रकार की परेशानी हो सुंदरकाणड कें पाठ सें दुर हो जाती हैं , यह ऐक श्रेष्ठ और सरल उपाय है , इसी वजह सें काफी लोग सुंदरकाणड का पाठ नियमित रूप सें करते हैं , हनुमानजी जो कि वानर थें , वे समुद्र को लांघकर लंका पहुंच गए वहां सीता की खोज की , लंका को जलाया सीता का संदेश लेकर श्रीराम के पास लौट आए , यह ऐक भक्त की जीत का काण्ड हैं , जो अपनी इच्छाशक्ति के बल पर इतना बड़ा चमत्कार कर सकता है , सुंदरकाणड में जीवन की सफलता के महत्वपूर्ण सूत्र भी दिए गए हैं , इसलिए पुरी रामायण में सुंदरकाणड को सबसें श्रेष्ठ माना जाता हैं , क्योंकि यह व्यक्ति में आत्मविश्वास बढ़ाता हैं , इसी वजह सें सुंदरकाणड का पाठ विषेश रूप सें किया जाता हैं !!
जय श्री राम ! जय श्री राम ! जय श्री राम ! जय श्री राम ! जय श्री राम !
जय जय जय सीयाराम ! सीयाराम जय जय राम ! सीता राम सीता राम सीता राम !
जय श्री राम भक्त हनुमानजी नमो नमः !!
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 3> दशहरे---- रावण ---- वध

प्रत्येक वर्ष की भांति दशहरे का त्योहार आ गया. सब लोग विशेष रूप से रावण के जलने का इंतजार कर रहे हैं . सभी मर्यादा पुरुषोतम श्री रामचन्द्र जी महाराज को याद करते हैं की किस प्रकार उन्होंने राक्षस रावण का वध कर धरती को पापी से मुक्त किया था. आज उनके उस पवित्र तप की स्मृति में रावण के पुतले का दहन किया जाता हैं ताकि जनमानस को प्रेरणा मिल सके की बुराई पर किस प्रकार अच्छे की जीत होती हैं.

एक प्रश्न मेरे मन में सदा आता हैं की क्या आज भी समाज में रावण फिर से जीवित हो उठा हैं? उत्तर हैं हाँ. रावण न केवल आज फिर से जीवित हो उठा हैं अपितु पहले से भी शक्तिशाली हो उठा हैं. वह रावण कौन हैं और कहाँ रहता हैं?

उत्तर हैं वह रावण हैं हमारी आतंरिक बुराइयाँ जो हमारे भीतर ही हैं और हमें दिन प्रतिदिन धर्म मार्ग से विचलित करती हैं.उसके दस सिर हैं जिन पर यम-नियम रुपी दस तलवारों से विजय प्राप्त करी जा सकती हैं. यह दस तलवारे कौन सी हैं और उनसे किन बुराइयों पर विजय प्राप्त करी जा सकती हैं.

इस आंतरिक रावण से लड़ने की दस तलवारे हैं यम और नियम. यम पांच हैं अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रहमचर्य और अपरिग्रह . नियम भी पांच हैं शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान. यम-नियम के पालन करने से हम अपनी आंतरिक बुराईयों को जो की रावण के दस सिर के समान हैं का सामना कर सकते हैं.
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4> श्री रामायण कथा

एक समय अयोध्या के पहुंचे हुए संत श्री रामायण कथा सुना रहे थे। रोज एक घंटा प्रवचन करते कितने ही लोग आते और आनंद विभोर होकर जाते।
साधु महाराज का नियम था रोज कथा शुरू करने से पहले
"आइए हनुमंत जी बिराजिए"
कहकर हनुमान जी का आह्वान करते थे, फिर एक घण्टा प्रवचन करते थे।
एक वकील साहब हर रोज कथा सुनने आते। वकील साहब के भक्तिभाव पर एकदिन तर्कशीलता हावी हो गई । उन्हें लगा कि महाराज रोज "आइए हनुमंत जी बिराजिए" कहते हैं तो क्या हनुमान जी सचमुच आते होंगे !

अत: वकील साहब ने महात्मा जी से पूछ ही डाला- महाराज जी आप रामायण की कथा बहुत अच्छी कहते हैं हमें बड़ा रस आता है परंतु आप जो गद्दी प्रतिदिन हनुमान जी को देते हैं उसपर क्या हनुमान जी सचमुच बिराजते हैं ?

साधु महाराज ने कहा… हाँ यह मेरा व्यक्तिगत विश्वास है कि रामकथा हो रही हो तो हनुमान जी अवश्य पधारते हैं ।

वकील ने कहा… महाराज ऐसे बात नहीं बनेगी, हनुमान जी यहां आते हैं इसका कोई सबूत दीजिए । आप लोगों को प्रवचन सुना रहे हैं सो तो अच्छा है लेकिन अपने पास हनुमान जी की उपस्थिति बताकर आप अनुचित तरीके से लोगों को प्रभावित कर रहे हैं ।

आपको साबित करके दिखाना चाहिए कि हनुमान जी आपकी कथा सुनने आते हैं ।

महाराज जी ने बहुत समझाया कि भैया आस्था को किसी सबूत की कसौटी पर नहीं कसना चाहिए यह तो भक्त और भगवान के बीच का प्रेमरस है, व्यक्तिगत श्रद्घा का विषय है । आप कहो तो मैं प्रवचन करना बंद कर दूँ या आप कथा में आना छोड़ दो ।

लेकिन वकील नहीं माना ।

कहता ही रहा कि आप कई दिनों से दावा करते आ रहे हैं । यह बात और स्थानों पर भी कहते होंगे, इसलिए महाराज आपको तो साबित करना होगा कि हनुमान जी कथा सुनने आते हैं ।

इस तरह दोनों के बीच वाद-विवाद होता रहा । मौखिक संघर्ष बढ़ता चला गया ।
हारकर साधु महाराज ने कहा… हनुमान जी हैं या नहीं उसका सबूत कल दिलाऊंगा । कल कथा शुरू हो तब प्रयोग करूंगा ।
जिस गद्दी पर मैं हनुमानजी को विराजित होने को कहता हूं आप उस गद्दी को आज अपने घर ले जाना, कल अपने साथ उस गद्दी को लेकर आना और फिर मैं कल गद्दी यहाँ रखूंगा ।
मैं कथा से पहले हनुमानजी को बुलाऊंगा फिर आप गद्दी ऊँची उठाना ।
यदि आपने गद्दी ऊँची कर दी तो समझना कि हनुमान जी नहीं हैं ।
वकील इस कसौटी के लिए तैयार हो गया ।
महाराज ने कहा… हम दोनों में से जो पराजित होगा वह क्या करेगा, इसका निर्णय भी कर लें ?
यह तो सत्य की परीक्षा है ।
वकील ने कहा- मैं गद्दी ऊँची न कर सका तो वकालत छोड़कर आपसे दीक्षा ले लूंगा ।
आप पराजित हो गए तो क्या करोगे ?
साधु ने कहा… मैं कथावाचन छोड़कर आपके ऑफिस का चपरासी बन जाऊंगा।
अगले दिन कथा पंडाल में भारी भीड़ हुई जो लोग रोजाना कथा सुनने नहीं आते थे, वे भी भक्ति, प्रेम और विश्वास की परीक्षा देखने आए।
काफी भीड़ हो गई। पंडाल भर गया । श्रद्घा और विश्वास का प्रश्न जो था।
साधु महाराज और वकील साहब कथा पंडाल में पधारे ।
गद्दी रखी गई ।
महात्मा जी ने सजल नेत्रों से मंगलाचरण किया और फिर बोले…
"आइए हनुमंत जी बिराजिए"
ऐसा बोलते ही साधु महाराज के नेत्र सजल हो उठे । मन ही मन साधु बोले… प्रभु ! आज मेरा प्रश्न नहीं बल्कि रघुकुल रीति की पंरपरा का सवाल है ।
मैं तो एक साधारण जन हूँ । मेरी भक्ति और आस्था की लाज रखना ।
फिर वकील साहब को निमंत्रण दिया गया…
आइए गद्दी ऊँची कीजिए ।
लोगों की आँखे जम गईं ।
वकील साहब खड़ेे हुए ।
उन्होंने गद्दी उठाने के लिए हाथ बढ़ाया पर गद्दी को स्पर्श भी न कर सके !
जो भी कारण रहा, उन्होंने तीन बार हाथ बढ़ाया, किन्तु तीनों बार असफल रहे।
महात्मा जी देख रहे थे,
गद्दी को पकड़ना तो दूर वकील साहब गद्दी को छू भी न सके ।
तीनों बार वकील साहब पसीने से तर-बतर हो गए।
वकील साहब साधु महाराज के चरणों में गिर पड़े और बोले…
महाराज गद्दी उठाना तो दूर, मुझे नहीं मालूम कि क्यों मेरा हाथ भी गद्दी तक नहीं पहुंच पा रहा है ।
अत: मैं अपनी हार स्वीकार करता हूं।
कहते है कि श्रद्घा और भक्ति के साथ की गई आराधना में बहुत शक्ति होती है ।
मानो तो देव नहीं तो पत्थर ।
प्रभु की मूर्ति तो पाषाण की ही होती है लेकिन भक्त के भाव से उसमें प्राण प्रतिष्ठा होती है और प्रभु बिराजते है ।

तुलसीदास जी कहते हैं -
साधु चरित सुभ चरित कषासू ।
निरस बिसद गुनमय फल जासू ।।
अर्थात् साधु का स्वभाव कपास जैसा होना चाहिए जो दूसरों के अवगुण को ढककर ज्ञान की अलख जगाए । जो ऐसा भाव प्राप्त कर ले वही साधु है ।
श्रद्घा और विश्वास मन को शक्ति देते हैं । संसार में बहुत कुछ ऐसा है जो हमारी तर्कशक्ति से, बुद्धि की सीमा से परेे है...:::!!!
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5>विचित्र दक्षिणा ------( Ram &Ravan )=भगवान श्री राम ने रामेश्वरम में जब शिवलिंग की स्थापना की

भगवान श्री राम ने रामेश्वरम में जब शिवलिंग की स्थापना की तब आचार्यत्व के लिए रावण को निमंत्रित किया था| रावण ने उस निमंत्रण को स्वीकार किया और उस अनुष्ठान का आचार्य बना| रावण त्रिकालज्ञ था, उसे पता था कि उसकी मृत्यु सिर्फ श्रीराम के हाथों लिखी है| वह कुछ भी दक्षिणा माँग सकता था| पर उसने क्या विचित्र दक्षिणा माँगी वह इस लेख में पढ़िए|

 रावण केवल शिव भक्त, विद्वान एवं वीर ही नहीं, अति-मानववादी भी था...उसे भविष्य का पता था...वह जानता था कि राम से जीत पाना उसके लिए असंभव था.....जामवंत जी को आचार्यत्व का निमंत्रण देने के लिए लंका भेजा गया....जामवन्त जी दीर्घाकार थे । आकार में वे कुम्भकर्ण से तनिक ही छोटे थे । इस बार राम ने बुद्ध-प्रबुद्ध, भयानक और वृहद आकार जामवन्त को भेजा है । पहले हनुमान, फिर अंगद और अब जामवन्त । यह भयानक समाचार विद्युत वेग की भाँति पूरे नगर में फैल गया । इस घबराहट से सबके हृदय की धड़कनें लगभग बैठ सी गई । निश्चित रूप से जामवन्त देखने में हनुमान और अंगद से अधिक ही भयावह थे । सागर सेतु लंका मार्ग प्रायः सुनसान मिला । कहीं-कहीं कोई मिले भी तो वे डर के बिना पूछे राजपथ की ओर संकेत कर देते थे। बोलने का किसी में साहस नहीं था । प्रहरी भी हाथ जोड़कर मार्ग दिखा रहे थे । इस प्रकार जामवन्त को किसी से कुछ पूछना नहीं पड़ा ।

यह समाचार द्वारपाल ने लगभग दौड़कर रावण तक पहुँचाया । स्वयं रावण उन्हें राजद्वार तक लेने आए । रावण को अभिवादन का उपक्रम करते देख जामवन्त ने मुस्कराते हुए कहा कि मैं अभिनंदन का पात्र नहीं हूँ । मैं वनवासी राम का दूत बनकर आया हूँ । उन्होंने तुम्हें सादर प्रणाम कहा है । रावण ने सविनय कहा – आप हमारे पितामह के भाई हैं । इस नाते आप हमारे पूज्य हैं । आप कृपया आसन ग्रहण करें । यदि आप मेंरा निवेदन स्वीकार कर लेंगे तभी संभवतः मैं भी आपका संदेश सावधानी से सुन सकूंगा । जामवन्त ने कोई आपत्ति नहीं की । उन्होंने आसन ग्रहण किया । रावण ने भी अपना स्थान ग्रहण किया । तदुपरान्त जामवन्त ने पुनः सुनाया कि वनवासी राम ने तुम्हें प्रणाम कहा है । वे सागर-सेतु निर्माण उपरांत अब यथाशीघ्र महेश्व-लिंग-विग्रह की स्थापना करना चाहते हैं । इस अनुष्ठान को सम्पन्न कराने के लिए उन्होने ब्राह्मण, वेदज्ञ और शैव रावण को आचर्य पद पर वरण करने की इच्ठा प्रकट की है । मैं उनकी ओर से आपको आमंत्रित करने आया हूँ ।

प्रणाम प्रतिक्रिया अभिव्यक्ति उपरान्त रावण ने मुस्कान भरे स्वर में पूछ ही लिया कि क्या राम द्वारा महेश्व-लिंग-विग्रह स्थापना लंका-विजय की कामना से किया जारहा है ? बिल्कुल ठीक । श्रीराम की महेश्वर के चरणों में पूर्ण भक्ति है ।

प्रहस्त आँख तरेरते हुए गुर्राया – अत्यंत धृष्टता, नितांत निर्लज्जता । लंकेश्वर ऐसा प्रस्ताव कभी भी स्वीकार नहीं करेंगे ।

मातुल ! तुम्हें किसने मध्यस्थताकरने को कहा ? लंकेश ने कठोर स्वर में फटकार दिया । जीवन में प्रथम बार किसी ने रावण को ब्राह्मण माना है और आचार्य बनने योग्य जाना है । क्या रावण इतना अधिक मूर्ख कहलाना चाहेगा कि वह भारतवर्ष के प्रथम प्रशंसित महर्षि पुलस्त्य के सगे भाई महर्षि वशिष्ठ के यजमान का आमंत्रण और अपने आराध्य की स्थापना हेतु आचार्य पद अस्वीकार कर दिया । लेकिन हाँ । यह जाँच तो नितांत आवश्यक है ही कि जब वनवासी राम ने इतना बड़ा आचार्य पद पर पदस्थ होने हेतु आमंत्रित किया है तब वह भी यजमान पद हेतु उचित अधिकारी है भी अथवा नहीं ।

जामवंत जी ! आप जानते ही हैं कि त्रिभुवन विजयी अपने इस शत्रु की लंकापुरी में आप पधारे हैं । यदि हम आपको यहाँ बंदी बना लें और आपको यहाँ से लौटने न दें तो आप क्या करेंगे ? जामवंत खुलकर हँसे । मुझे निरुद्ध करने की शक्ति समस्त लंका के दानवों के संयुक्त प्रयास में नहीं है, किन्तु मुझ किसी भी प्रकार की कोई विद्वत्ता प्रकट करने की न तो अनुमति है और न ही आवश्यकता । ध्यान रहे, मैं अभी एक ऐसे उपकरण के साथ यहां विद्यमान हूँ, जिसके माध्यम से धनुर्धारी लक्ष्मण यह दृश्यवार्ता स्पष्ट रूप से देख-सुन रहेहैं । जब मैं वहाँ से चलने लगा था तभी धनुर्वीर लक्ष्मण वीरासन में बैठे हुए हैं । उन्होंने आचमन करके अपने त्रोण से पाशुपतास्त्र निकाल कर संधान कर लिया है और मुझसे कहा है कि जामवन्त ! रावण से कह देना कि यदि आप में से किसी ने भी मेरा विरोध प्रकट करने की चेष्टा की तो यह पाशुपतास्त्र समस्त दानव कुल के संहार का संकल्प लेकर तुरन्त छूट जाएगा । इस कारण भलाई इसी में है कि आप मुझे अविलम्ब वांछित प्रत्युत्तर के साथ सकुशल और आदर सहित धनुर्धर लक्ष्मण के दृष्टिपथ तक वापस पहुँचने की व्यवस्था करें ।

उपस्थित दानवगण भयभीत हो गए । प्रहस्थ का शरीर पसीने से लथपथ हो गया । लंकेश तक काँप उठे । पाशुपतास्त्र ! महेश्वर का यह अमोघ अस्त्र तो सृष्टि में एक साथ दो धनुर्धर प्रयोग ही नहीं कर सकते । अब भले ही वह रावण मेघनाथ के त्रोण में भी हो । जब लक्ष्मण ने उसे संधान स्थिति में ला ही दिया है, तब स्वयं भगवान शिव भी अब उसे उठा नहीं सकते । उसका तो कोई प्रतिकार है ही नहीं । रावण ने अपने आपको संभाल कर कहा – आप पधारें । यजमान उचित अधिकारी है । उसे अपने दूत को संरक्षण देना आता है । राम से कहिएगा कि मैंने उसका आचार्यत्व स्वीकार किया।

जामवन्त को विदा करने के तत्काल उपरान्त लंकेश ने सेवकों को आवश्यक सामग्री संग्रह करने हेतु आदेश दिया और स्वयं अशोक वाटिका पहुँचे, जो आवश्यक उपकरण यजमान उपलब्ध न कर सके जुटाना आचार्य का परम कर्त्तव्य होता है। रावण जानता है कि वनवासी राम के पास क्या है और क्या होना चाहिए । अशोक उद्यान पहुँचते ही रावण ने सीता से कहा कि राम लंका विजय की कामना समुद्रतट पर महेश्वर लिंग विग्रह की स्थापना करने जा रहे हैं और रावण को आचार्य वरण किया है । यजमान का अनुष्ठान पूर्ण हो यह दायित्व आचार्य का भी होता है । तुम्हें विदित है कि अर्द्धांगिनी के बिना गृहस्थ के सभी अनुष्ठान अपूर्ण रहते हैं । विमान आ रहा है, उस पर बैठ जाना । ध्यान रहे कि तुम वहाँ भी रावण के अधीन ही रहोगी । अनुष्ठान समापन उपरान्त यहाँ आने के लिए विमान पर पुनः बैठ जाना । स्वामी का आचार्य अर्थात् स्वयं का आचार्य । यह जान जानकी जी ने दोनों हाथ जोड़कर मस्तक झुका दिया । स्वस्थ कण्ठ से सौभाग्यवती भव कहते रावण ने दोनों हाथ उठाकर भरपूर आशीर्वाद दिया ।

सीता और अन्य आवश्यक उपकरण सहित रावण आकाश मार्ग से समुद्र तट पर उतरा । आदेश मिलने पर आना कहकर सीता को उसने विमान में ही छोड़ा और स्वयं राम के सम्मुख पहुँचा । जामवन्त से संदेश पाकर भाई, मित्र और सेना सहित श्रीराम स्वागत सत्कार हेतु पहले से ही तत्पर थे । सम्मुख होते ही वनवासी राम आचार्य दशग्रीव को हाथ जोड़कर प्रणाम किया । दीर्घायु भव ! लंका विजयी भव ! दशग्रीव के आशीर्वचन के शब्द ने सबको चौंका दिया । सुग्रीव ही नहीं विभीषण को भी उसने उपेक्षा कर दी । जैसे वे वहाँ हों ही नहीं ।

भूमि शोधन के उपरान्त रावणाचार्य ने कहा कि यजमान ! अर्द्धांगिनी कहाँ है ? उन्हें यथास्थान आसन दें । श्रीराम ने मस्तक झुकाते हुए हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्र स्वर से प्रार्थना की कि यदि यजमान असमर्थ हो तो योग्याचार्य सर्वोत्कृष्ट विकल्प के अभाव में अन्य समकक्ष विकल्प से भी तो अनुष्ठान सम्पादन कर सकते हैं । अवश्य-अवश्य, किन्तु अन्य विकल्प के अभाव में ऐसा संभव है, प्रमुख विकल्प के अभाव में नहीं । यदि तुम अविवाहित, विधुर अथवा परित्यक्त होते तो संभव था । इन सबके अतिरिक्त तुम सन्यासी भी नहीं हो और पत्नीहीन वानप्रस्थ का भी तुमने व्रत नहीं लिया है । इन परिस्थितियों में पत्नीरहित अनुष्ठान तुम कैसे कर सकते हो ? कोई उपाय आचार्य ? आचार्य आवश्यक साधन, उपकरण अनुष्ठान उपरान्त वापस ले जाते हैं । स्वीकार हो तो किसी को भेज दो, सागर सन्निकट पुष्पक विमान में यजमान पत्नी विराजमान हैं । श्रीराम ने हाथ जोड़कर मस्तक झुकाते हुए मौन भाव से इस सर्वश्रेष्ठ युक्ति को स्वीकार किया ।

श्री रामादेश के परिपालन में विभीषण मंत्रियों सहित पुष्पक विमान तक गए और सीता सहित लौटे । अर्द्ध यजमान के पार्श्व में बैठो अर्द्ध यजमान । आचार्य के इस आदेश का वैदेही ने पालन किया । गणपति पूजन, कलश स्थापना और नवग्रह पूजन उपरान्त आचार्य ने पूछा लिंग विग्रह ? यजमान ने निवेदन किया कि उसे लेने गत रात्रि के प्रथम प्रहर से पवनपुत्र कैलाश गए हुए हैं । अभी तक लौटे नहीं हैं । आते ही होंगे । आचार्य ने आदेश दे दिया विलम्ब नहीं किया जा सकता । उत्तम मुहूर्त उपस्थित है । इसलिए अविलम्ब यजमान-पत्नी बालुका-लिंग-विग्रह स्वयं बना ले । जनक नंदिनी ने स्वयं के कर-कमलों से समुद्र तट की आर्द्र रेणुकाओं से आचार्य के निर्देशानुसार यथेष्ट लिंग-विग्रह निर्मित की । यजमान द्वारा रेणुकाओं का आधार पीठ बनाया गया । श्रीसीताराम ने वही महेश्वर लिंग-विग्रह स्थापित किया । आचार्य ने परिपूर्ण विधि-विधान के साथ अनुष्ठान सम्पन्न कराया ।

अब आती है बारी आचार्य की दक्षिणा की......राम ने पूछा आपकी दक्षिणा? पुनः एक बार सभी को चौंकाया आचार्य के शब्दों ने । घबराओ नहीं यजमान । स्वर्णपुरी के स्वामी की दक्षिणा सम्पत्ति नहीं हो सकती । आचार्य जानते हैं कि उनका यजमान वर्तमान में वनवासी है, लेकिन फिर भी राम अपने आचार्य कि जो भी माँग हो उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा करता है ।

आचार्य जब मृत्यु शैय्या ग्रहण करे तब यजमान सम्मुख उपस्थित रहे । आचार्य ने अपनी दक्षिणा मांगी । ऐसा ही होगा आचार्य । यजमान ने वचन दिया और समय आने पर निभाया भी । “रघुकुल रीति सदा चली आई । प्राण जाई पर वचन न जाई ।” यह दृश्य वार्ता देख सुनकर सभी ने उपस्थित समस्त जन समुदाय के नयनाभिराम प्रेमाश्रुजल से भर गए । सभी ने एक साथ एक स्वर से सच्ची श्रद्धा के साथ इस अद्भुत आचार्य को प्रणाम किया ।

रावण जैसे भविष्यदृष्टा ने जो दक्षिणा माँगी, उससे बड़ी दक्षिणा क्या हो सकती थी? जो रावण यज्ञ-कार्य पूरा करने हेतु राम की बंदी पत्नी को शत्रु के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है, व राम से लौट जाने की दक्षिणा कैसे मांग सकता है?

बहुत कुछ हो सकता था काश राम को वनवास न होता काश सीता वन न जाती किन्तु ये धरती तो है ही पाप भुगतने वालों के लिए और जो यहाँ आया है उसे अपने पाप भुगतने होंगे और इसलिए रावण जैसा पापी लंका का स्वामी तो हो सकता है देवलोक का नहीं |

वह तपस्वी रावण जिसे मिला था- // ब्रह्मा से विद्वता और अमरता का वरदान // शिव भक्ति से पाया शक्ति का वरदान....

चारों वेदों का ज्ञाता, // ज्योतिष विद्या का पारंगत, // अपने घर की वास्तु शांति हेतु // आचार्य रूप में जिसे-

भगवन शंकर ने किया आमंत्रित .....// शिव भक्त रावण- // रामेश्वरम में शिवलिंग पूजा हेतु

अपने शत्रु प्रभु राम का- // जिसने स्वीकार किया निमंत्रण ....// आयुर्वेद, रसायन और कई प्रकार की

जानता जो विधियां, // अस्त्र शास्त्र,तंत्र-मन्त्र की सिद्धियाँ .... // शिव तांडव स्तोत्र का महान कवि,

अग्नि-बाण ब्रह्मास्त्र का ही नहि, // बेला या वायलिन का आविष्कर्ता, // जिसे देखते ही दरबार में

राम भक्त हनुमान भी एक बार // मुग्ध हो, बोल उठे थे - // "राक्षस राजश्य सर्व लक्षणयुक्ता"....

काश रामानुज लक्ष्मण ने // सुर्पणखा की नाक न कटी होती, // काश रावण के मन में सुर्पणखा

के प्रति अगाध प्रेम न होता, /गर बदला लेने के लिए सुर्पणखा ने // रावण को न उकसाया होता -

रावण के मन में सीता हरण का // ख्याल कभी न आया होता .... // इस तरह रावण में-

अधर्म बलवान न होता, // तो देव लोक का भी- // स्वामी रावण ही होता .....

(रामेश्वरम् देवस्थान में लिखा हुआ है कि इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना श्रीराम ने रावण द्वारा करवाई थी| बाल्मीकि

रामायण और तुलसीकतृ रामायण में इस कथा का वर्णन नहीं है, पर तमिल भाषा में लिखी महर्षि कम्बन की

'इरामावतारम्' मे यह कथा है|)

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6>अध्यात्म रामायण की एक कथा

महादेवजी-पार्वती संग झूमे

रावण के वध के बाद अयोध्या पति श्री राम ने राजपाट संभाल लिया था और प्रजा राम राज्य से प्रसन्न थी, एक दिन भगवान महादेव की इच्छा श्री राम से मिलने की हुई,

पार्वती जी को संग लेकर महादेव कैलाश पर्वत से अयोध्या नगरी के लिए चल पड़े, भगवान शिव और मां पार्वती को अयोध्या आया देखकर श्री सीता राम जी बहुत खुश हुए,

माता जानकी ने उनका उचित आदर सत्कार किया और स्वयं भोजन बनाने के लिए रसोई में चली गईं, भगवान शिव ने श्री राम से पूछा- हनुमान जी दिखाई नहीं पड़ रहे हैं, कहां हैं ?

श्री राम बोले- वह बगीचे में होंगे, शिव जी ने श्री राम जी से बगीचे में जाने की अनुमति मांगी और पार्वती जी के साथ बगीचे में आ गए, बगीचे की खूबसूरती देखकर उनका मन मोहित हो गया,

आम के एक घने वृक्ष के नीचे हनुमान जी दीन-दुनिया से बेखबर गहरी नींद में सोए थे और एक लय में खर्राटों से राम नाम की ध्वनि उठ रही थी, चकित होकर शिव जी और माता पार्वती एक दूसरे की ओर देखने लगे,

माता पार्वती मुस्करा उठी और वृक्ष की डालियों की ओर इशारा किया, राम नाम सुनकर पेड़ की डालियां भी झूम रही थीं, उनके बीच से भी राम नाम उच्चारित हो रहा था,

शिव जी इस राम नाम की धुन में मस्त मगन होकर खुद भी राम राम कहकर नाचने लगे, माता पार्वती जी ने भी अपने पति का अनुसरण किया, भक्ति में भरकर उनके पांव भी थिरकने लगे,

शिव जी और पार्वती जी के नृत्य से ऐसी झनकार उठी कि स्वर्गलोक के देवतागण भी आकर्षित होकर बगीचे में आ गए और राम नाम की धुन में सभी मस्त हो गए,

माता जानकी भोजन तैयार करके प्रतीक्षारत थीं परंतु संध्या घिरने तक भी अतिथि नहीं पधारे तब अपने देवर लक्ष्मण जी को बगीचे में भेजा,

लक्ष्मण जी ने तो अवतार ही लिया था श्री राम की सेवा के लिए, अतः बगीचे में आकर जब उन्होंने धरती पर स्वर्ग का नजारा देखा तो खुद भी राम नाम की धुन में झूम उठे,

महल में माता जानकी परेशान हो रही थीं कि अभी तक भोजन ग्रहण करने कोई भी क्यों नहीं आया, उन्होंने श्री राम से कहा भोजन ठंडा हो रहा है चलिए हम ही जाकर बगीचे में से सभी को बुला लाएं,

जब सीता राम जी बगीचे में गए तो वहां राम नाम की धूम मची हुई थी, हुनमान जी गहरी नींद में सोए हुए थे और उनके खर्राटों से अभी तक राम नाम निकल रहा था,

श्री सिया राम भाव विह्वल हो उठे, श्री राम जी ने हनुमान जी को नींद से जगाया और प्रेम से उनकी तरफ निहारने लगे, प्रभु को आया देख हनुमान जी शीघ्रता से उठ खड़े हुए, नृत्य का माहौल भंग हो गया,

शिव जी खुले कंठ से हनुमान जी की राम भक्ति की सराहना करने लगे, हनुमान जी सकुचाए लेकिन मन ही मन खुश हो रहे थे,
श्री सीया राम जी ने भोजन करने का आग्रह भगवान शिव से किया,

सभी लोग महल में भोजन करने के लिए चल पड़े. माता जानकी भोजन परोसने लगीं, हुनमान जी को भी श्री राम जी ने पंक्ति में बैठने का आदेश दिया,

हनुमान जी बैठ तो गए परंतु आदत ऐसी थी की श्री राम के भोजन के उपरांत ही सभी भोजन करते थे,

आज श्री राम के आदेश से पहले भोजन करना पड़ रहा था, माता जानकी हनुमान जी को भोजन परोसती जा रही थी पर हनुमान का पेट ही नहीं भर रहा था, कुछ समय तक तो उन्हें भोजन परोसती रहीं फिर समझ गईं इस तरह से हनुमान जी का पेट नहीं भरने वाला,

उन्होंने तुलसी के एक पत्ते पर राम नाम लिखा और भोजन के साथ हनुमान जी को परोस दिया. तुलसी पत्र खाते ही हनुमान जी को संतुष्टि मिली और वह भोजन पूर्ण मानकर उठ खड़े हुए,

भगवान शिव शंकर ने प्रसन्न होकर हनुमान जी को आशीर्वाद दिया कि आप की राम भक्ति युगों-युगों तक याद की जाएगी और आप संकट मोचन कहलाएंगे
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7> तिनके का रहस्य !

रावण अपनी समस्त ताकत लगा चुका था लेकिन जगत जननी माँ को आज तक कोई नहीं समझ सका फिर रावण भी कैसे समझ पाता !

रावण एक बार फिर आया और बोला मैं तुमसे सीधे सीधे संवाद करता हूँ लेकिन तुम कैसी नारी हो की मेरे आते ही घास का तिनका उठाकर उसे ही घूर घूर कर देखने लगती हो, क्या घास का तिनका तुम्हें राम से भी ज्यादा प्यारा है ?


रावण के इस प्रश्न को सुनकर माँ सीता जी बिलकुल चुप हो गयी और आँख से आसुओं की धार बह पड़ी

"अब इस प्रश्न का उत्तर समझो" -

जब श्री राम जी का विवाह माँ सीता जी के साथ हुआ, तब सीता जी का बड़े आदर सत्कार के साथ गृह प्रवेश भी हुआ बहुत उत्सव मनाया गया, जैसे की एक प्रथा है की नव वधू जब ससुराल आती है तो उस नववधू के हाथ से कुछ मीठा पकवान बनवाया जाता है, ताकि जीवन भर घर पर मिठास बनी रहे !

इसलिए माँ सीता जी ने उस दिन अपने हाथो से घर पर खीर बनाई और समस्त परिवार राजा दशरथ सहित चारो भ्राता और ऋषि संत भी भोजन पर आमंत्रित थे, माँ सीता ने सभी को खीर परोसना शुरू किया, और भोजन शुरू होने ही वाला था की ज़ोर से एक हवा का झोका आया सभी ने अपनी अपनी पत्तल सम्हाली, सीता जी देख रही थी, ठीक उसी समय राजा दशरथ जी की खीर पर एक छोटा सा घास का तिनका गिर गया, माँ सीता जी ने उस तिनके को देख लिया, लेकिन अब खीर मे हाथ कैसे डालें ये प्रश्न आ गया, माँ सीता जी ने दूर से ही उस तिनके को घूर कर जो देखा, तो वो तिनका जल कर राख की एक छोटी सी बिंदु बनकर रह गया, सीता जी ने सोचा अच्छा हुआ किसी ने नहीं देखा, लेकिन राजा दशरथ माँ सीता जी का यह चमत्कार को देख रहे थे, फिर भी दशरथ जी चुप रहे और अपने कक्ष मे चले गए और माँ सीता जी को बुलवाया !

फिर राजा दशरथ बोले मैंने आज भोजन के समय आप के चमत्कार को देख लिया था, आप साक्षात जगत जननी का दूसरा रूप हैं, लेकिन एक बात आप मेरी जरूर याद रखना आपने जिस नजर से आज उस तिनके को देखा था उस नजर से आप अपने शत्रु को भी मत देखना, इसीलिए माँ सीता जी के सामने जब भी रावण आता था तो वो उस घास के तिनके को उठाकर राजा दशरथ जी की बात याद कर लेती थी...!

यही है उस तिनके का रहस्य !

माता सीता जी चाहती तो रावण को जगह पर ही राख़ कर सकती थी लेकिन राजा दशरथ जी को दिये वचन की वजह से वो शांत रही !
जय श्रीसीताराम
जय श्रीराधेकृष्ण

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