Sunday, February 21, 2016

2> राम राम दो बार+रामकावंशपरिचय+रामकी बहन+लक्ष्मण के त्याग +क्या हैं "भगवान राम"===>( 1 to 8 )

2>রামায়ণ=Post=2***राम राम " दो बार क्यों***( 1 to 8 )

1>----------------- " राम राम " दो बार क्यों ?
2>-------------------"राम" का वंश परिचय
3>---------------- भगवान राम की बहन
4>-------------------लक्ष्मण जी के त्याग की अदभुत कथा जिज्ञासा÷
5>-------------------क्या हैं "भगवान राम"..??
6>-------------------जब श्रीरामचन्द्र जी को कुत्ते ने बताया न्याय का अनोखा तरीका

7>-------------क्यों कर लिया सीताजी ने हनुमानजी की बातों पर विश्वास?

8>-----------रावण का होगा सर्वनाश, त्रिजटा ने कर दी थी भविष्यवाणी क्योंकि....



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1> " राम राम " दो बार क्यों ?

क्या कभी सोचा है कि बहुत से लोग जब एक दूसरे से मिलते हैं तो आपस में एक दूसरे को दो बार ही “राम राम" क्यों बोलते हैं ? एक बार या तीन बार क्यों नही बोलते ? दो बार “राम राम" बोलने के पीछे बड़ा गूढ़ रहस्य है क्योंकि यह आदि काल से ही चला आ रहा है.हिन्दी की शब्दावली में ‘र' सत्ताइस्व्वां शब्द है, ‘आ’ की मात्रा दूसरा और ‘म' पच्चीसवां शब्द है. अब तीनो अंको का योग करें तो 27 + 2 + 25 = 54, अर्थात एक “राम” का योग 54 हुआ. इसी प्रकार दो “राम राम” का कुल योग 108 होगा।  हम जब कोई जाप करते हैं तो 108 मनके की माला गिनकर करते हैं।

सिर्फ 'राम राम' कह देने से ही पूरी माला का जाप हो जाता है।

2>"राम" का वंश परिचय
     BKS: कभी सोचा है की प्रभु श्री राम के दादा परदादा का नाम क्या था?
नहीं तो जानिये-
1 - ब्रह्मा जी से मरीचि हुए,----------- 2 - मरीचि के पुत्र कश्यप हुए,-- 3 - कश्यप के पुत्र विवस्वान थे,
4 - विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए.वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था,
5 - वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था, इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और 
     इस प्रकार इक्ष्वाकु कुलकी स्थापना की | - - - - - - - - -- -  -  -  - 6 - इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए,
7 - कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था-------   -- - --  --  -  --  - - - - --8 - विकुक्षि के पुत्र बाण हुए, 
9 - बाण के पुत्र अनरण्य हुए,-- -  -  -  -  -  -  -   - -- - - - - -  - - - 10- अनरण्य से पृथु हुए,                                           
11- पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ,--- - - - - - - - - - - - - - - - - -- - -12- त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए,
13- धुन्धुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था,--- - - - - - - - - - - - - - - -14- युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए,
15- मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ,--- - - - - - - - - - - - -- - -- -16- सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित,
17- ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए,-- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -18- भरत के पुत्र असित हुए,
19- असित के पुत्र सगर हुए,--- - - - - - - - - - - - - - - - - - - -- - -20- सगर के पुत्र का नाम असमंज था,
21- असमंज के पुत्र अंशुमान हुए,-- - - - - - - - - - - - - - - - - - --22- अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए,
23- दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए, भागीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतारा था.भागीरथ के पुत्र ककुत्स्थ थे |
24- ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए, रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम
     रघुवंश हो गया, तब से श्री राम के कुल को रघु कुल भी कहा जाता है |
25- रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए,-- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -26- प्रवृद्ध के पुत्र शंखण थे,
27- शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए,-- - - - - - - - - - - - - - - - - - - -- 28- सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था,
29- अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग हुए,-- - - - - - - - - - - - - - - - - - - --30- शीघ्रग के पुत्र मरु हुए,
31- मरु के पुत्र प्रशुश्रुक थे,-- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -32- प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए,
33- अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था,--- - - - - - - - - - - - - - --34- नहुष के पुत्र ययाति हुए,
35- ययाति के पुत्र नाभाग हुए,- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - ---36- नाभाग के पुत्र का नाम अज था,
37- अज के पुत्र दशरथ हुए,
38- दशरथ के चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हुए |
इस प्रकार ब्रह्मा की उन्चालिसवी --- - - - - - - - - - - - - - - - - - -(39) पीढ़ी में श्रीराम का जन्म हुआ |     ..
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3> भगवान राम की बहन
 🌷धर्म आध्यात्म और ज्योतिष ग्रुप🌷

🙏मित्रों आज आपको भगवान राम की बहन के बारे में जानकारी देते है🙏

🙏शांता🙏
कौन थीं भगवान राम की बहन, जानिए दक्षिण में वाल्मीकि रामायण, कंबन रामायण और रामचरित मानस, अद्भुत रामायण, अध्यात्म रामायण और आनंद रामायण की चर्चा ज्यादा होती है। उक्त रामायण का अध्ययन करने पर हमें रामकथा से जुड़े कई नए तथ्यों की जानकारी मिलती है। इसी तरह अगर दक्षिण की रामायण की मानें तो भगवान राम की एक बहन भी थीं, जो उनसे बड़ी थी। अब तक आप सिर्फ यही जानते आए हैं कि राम के तीन भाई लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न थे, लेकिन राम की बहन के बारे में कम लोग ही जानते हैं। बहुत दुखभरी कथा है राम की बहन की।

आओ जानते हैं कि राम की यह बहन कौन थीं। इसका नाम क्या था और यह कहां रहती थी। दक्षिण भारत की रामायण के अनुसार राम की बहन का नाम शांता था, जो चारों भाइयों से बड़ी थीं। शांता राजा दशरथ और कौशल्या की पुत्री थीं, लेकिन पैदा होने के कुछ वर्षों के बाद ही अंगदेश के राजा रोमपद ने निःशंतान होने के कारण राजा दशरथ से उनकी बेटी शांता को दत्तक पुत्री के रूप में गोद ले लिया था | भगवान राम की बड़ी बहन का पालन-पोषण राजा रोमपद और उनकी पत्नी वर्षिणी ने किया, जो महारानी कौशल्या की बहन अर्थात राम की मौसी थीं। इस संबंध में तीन कथाएं हैं।

1.पहली : वर्षिणी नि:संतान थीं तथा एक बार अयोध्या में उन्हों ने हंसी-हंसी में ही बच्चे की मांग की। दशरथ भी मान गए। रघुकुल का दिया गया वचन निभाने के लिए शांता अंगदेश की राजकुमारी बन गईं। शांता वेद, कला तथा शिल्प में पारंगत थीं और वे अत्यधिक सुंदर भी थीं।

2.दूसरी : लोककथा अनुसार शांता जब पैदा हुई, तब अयोध्या में अकाल पड़ा और 12 वर्षों तक धरती धूल-धूल हो गई। चिंतित राजा को सलाह दी गई कि उनकी पुत्री शांता ही अकाल का कारण है। राजा दशरथ ने अकाल दूर करने के लिए अपनी पुत्री शांता को वर्षिणी को दान कर दिया। उसके बाद शांता कभी अयोध्या नहीं आई। कहते हैं कि दशरथ उसे अयोध्या बुलाने से डरते थे इसलिए कि कहींफिर से अकाल नहीं पड़ जाए।

3.तीसरी कथा : कुछ लोग मानते थे कि राजा दशरथ ने शांता को सिर्फ इसलिए गोद दे दिया था, क्योंकि वह लड़की होने की वजह से उनकी उत्तराधिकारी नहीं बन सकती थीं।

शांता का विवाह महर्षि विभाण्डक के पुत्र ऋंग ऋषि से हुआ। एक दिन जब विभाण्डक नदी में स्नान कर रहे थे, तब नदी में ही उनका वीर्यपात हो गया। उस जल को एक हिरणी ने पी लिया था जिसके फलस्वरूप ऋंग ऋषि का जन्म हुआ था।एक बार एक ब्राह्मण अपने क्षेत्र में फसल की पैदावार के लिए मदद करने के लिए राजा रोमपद के पास गया, तो राजा ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। अपने भक्त की बेइज्जती पर गुस्साए इंद्रदेव ने बारिश नहीं होने दी, जिस वजह से सूखा पड़ गया। तब राजा ने ऋंग ऋषि को यज्ञ करने के लिए बुलाया। यज्ञ के बाद भारी वर्षा हुई। जनता इतनी खुश हुई कि अंगदेश में जश्न का माहौल बन गया। तभी वर्षिणी और रोमपद ने अपनी गोद ली हुई बेटी शांता का हाथ ऋंग ऋषि को देने का फैसला किया।

राजा दशरथ और इनकी तीनों रानियां इस बात को लेकर चिंतित रहती थीं कि पुत्र नहीं होने पर उत्तराधिकारी कौन होगा। इनकी चिंता दूर करने के लिए ऋषि वशिष्ठ सलाह देते हैं कि आप अपने दामाद ऋंग ऋषि से पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाएं। इससे पुत्र की प्राप्ति होगी। दशरथ ने उनके मंत्री सुमंत की सलाह पर पुत्र कामेष्ठि यज्ञ में महान ऋषियों को बुलाया। इस यज्ञ में दशरथ ने ऋंग ऋषि को भी बुलाया। ऋंग ऋषि एक पुण्य आत्मा थे तथा जहां वे पांव रखते थे वहां यश होता था। सुमंत ने ऋंग को मुख्य ऋत्विक बनने के लिए कहा। दशरथ ने आयोजन करने का आदेश दिया।षपहले तो ऋंग ऋषि ने यज्ञ करने से इंकार किया लेकिन बाद में शांता के कहने पर ही ऋंग ऋषि राजा दशरथ के लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ करने के लिए तैयार हुए थे। लेकिन...दशरथ ने केवल ऋंग ऋषि (उनके दामाद) को ही आमंत्रित किया लेकिन ऋंग ऋषि ने कहा कि मैं अकेला नहीं आ सकता। मेरी पत्नी शांता को भी आना पड़ेगा। ऋंग ऋषि की यह बात जानकर राजा दशरथ विचार में पड़ गए, क्योंकि उनके मन में अभी तक दहशत थी कि कहीं शांता के अयोध्या में आने से फिर से अकाल नहीं पड़ जाए। लेकिन जब पुत्र की कामना से पुत्र कामेष्ठि यज्ञ के दौरान उन्होंने अपने दामाद ऋंग ऋषि को बुलाया, तो दामाद ने शांता के बिना आने से इंकार कर दिया। तब पुत्र कामना में आतुर दशरथ ने संदेश भिजवाया कि शांता भी आ जाए। शांता तथा ऋंग ऋषि अयोध्या पहुंचे। शांता के पहुंचते ही अयोध्या में वर्षा होने लगी और फूल बरसने लगे। शांता ने दशरथ के चरण स्पर्श किए। दशरथ ने आश्चर्यचकित होकर पूछा कि 'हे देवी, आप कौन हैं? आपके पांव रखते ही चारों ओर वसंत छा गया है।' जब माता-पिता (दशरथ और कौशल्या) विस्मित थे कि वो कौन है? तब शांता ने बताया कि 'वो उनकी पुत्री शांता है।' दशरथ और कौशल्या यह जानकर अधिक प्रसन्न हुए। वर्षों बाद दोनों ने अपनी बेटी को देखा था।दशरथ ने दोनों को ससम्मान आसन दिया और उन दोनों की पूजा-आरती की। तब ऋंग ऋषि ने पुत्रकामेष्ठि यज्ञ किया तथा इसी से भगवान राम तथा शांता के अन्य भाइयों का जन्म हुआ ।कहते हैं कि पुत्रेष्ठि यज्ञ कराने वाले का जीवनभर का पुण्य इस यज्ञ की आहुति में नष्ट हो जाता है। इस पुण्य के बदले ही राजा दशरथ को पुत्रों की प्राप्ति हुई। राजा दशरथ ने ऋंग ऋषि को यज्ञ करवाने के बदले बहुत-सा धन दिया जिससे ऋंग ऋषि के पुत्र और कन्या का भरण-पोषण हुआ और यज्ञ से प्राप्त खीर से राम, लक्ष्मण,भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ। ऋंग ऋषि फिर से पुण्य अर्जित करने के लिए वन में जाकर तपस्या करने लगे। रामायण और रामचरित मानस में शांता के चित्र क्यों नहीं…जनता के समक्ष शान्ता ने कभी भी किसी को नहीं पता चलने दिया कि वो राजा दशरथ और कौशल्या की पुत्री हैं। यही कारण है कि रामायण या रामचरित मानस में उनका खास उल्लेख नहीं मिलता है। ऐसा माना जाता है।



4>  लक्ष्मण जी के त्याग की अदभुत कथा जिज्ञासा÷  

लक्ष्मण जी के त्याग की अदभुत कथा जिज्ञासा÷। एक अनजाने सत्य से परिचय---
-हनुमानजी की रामभक्ति की गाथा संसार में भर में गाई जाती है।
लक्ष्मणजी की भक्ति भी अद्भुत थी. लक्ष्मणजी की कथा के बिना श्री रामकथा पूर्ण नहीं है अगस्त्य मुनि अयोध्या आए और लंका युद्ध का प्रसंग छिड़ गया -


भगवान श्रीराम ने बताया कि उन्होंने कैसे रावण और कुंभकर्ण जैसे प्रचंड वीरों का वध किया और लक्ष्मण ने भी इंद्रजीत और अतिकाय जैसे शक्तिशाली असुरों को मारा॥
अगस्त्य मुनि बोले-
श्रीराम बेशक रावण और कुंभकर्ण प्रचंड वीर थे, लेकिन सबसे बड़ा वीर तो मेघनाध ही था ॥ उसने अंतरिक्ष में स्थित होकर इंद्र से युद्ध किया था और बांधकर लंका ले आया था॥
ब्रह्मा ने इंद्रजीत से दान के रूप में इंद्र को मांगा तब इंद्र मुक्त हुए थे ॥
लक्ष्मण ने उसका वध किया इसलिए वे सबसे बड़े योद्धा हुए ॥
श्रीराम को आश्चर्य हुआ लेकिन भाई की वीरता की प्रशंसा से वह खुश थे॥
फिर भी उनके मन में जिज्ञासा पैदा हुई कि आखिर अगस्त्य मुनि ऐसा क्यों कह रहे हैं कि इंद्रजीत का वध रावण से ज्यादा मुश्किल था ॥
अगस्त्य मुनि ने कहा- प्रभु इंद्रजीत को वरदान था कि उसका वध वही कर सकता था जो
💥 चौदह वर्षों तक न सोया हो,
💥 जिसने चौदह साल तक किसी स्त्री का मुख न देखा हो और
💥 चौदह साल तक भोजन न किया हो ॥
श्रीराम बोले- परंतु मैं बनवास काल में चौदह वर्षों तक नियमित रूप से लक्ष्मण के हिस्से का फल-फूल देता रहा ॥
मैं सीता के साथ एक कुटी में रहता था, बगल की कुटी में लक्ष्मण थे, फिर सीता का मुख भी न देखा हो, और चौदह वर्षों तक सोए न हों, ऐसा कैसे संभव है ॥
अगस्त्य मुनि सारी बात समझकर मुस्कुराए॥ प्रभु से कुछ छुपा है भला!
दरअसल, सभी लोग सिर्फ श्रीराम का गुणगान करते थे लेकिन प्रभु चाहते थे कि लक्ष्मण के तप और वीरता की चर्चा भी अयोध्या के घर-घर में हो ॥
अगस्त्य मुनि ने कहा - क्यों न लक्ष्मणजी से पूछा जाए ॥
लक्ष्मणजी आए प्रभु ने कहा कि आपसे जो पूछा जाए उसे सच-
सच कहिएगा॥
प्रभु ने पूछा- हम तीनों चौदह वर्षों तक साथ रहे फिर तुमने सीता का मुख कैसे नहीं देखा ?
फल दिए गए फिर भी अनाहारी कैसे रहे ?
और 14 साल तक सोए नहीं ?
यह कैसे हुआ ?
लक्ष्मणजी ने बताया- भैया जब हम भाभी को तलाशते ऋष्यमूक पर्वत गए तो सुग्रीव ने हमें उनके आभूषण दिखाकर पहचानने को कहा ॥
आपको स्मरण होगा मैं तो सिवाए उनके पैरों के नुपूर के कोई आभूषण नहीं पहचान पाया था क्योंकि मैंने कभी भी उनके चरणों के ऊपर देखा ही नहीं.
चौदह वर्ष नहीं सोने के बारे में सुनिए - आप औऱ माता एक कुटिया में सोते थे. मैं रातभर बाहर धनुष पर बाण चढ़ाए पहरेदारी में खड़ा रहता था. निद्रा ने मेरी आंखों पर कब्जा करने की कोशिश की तो मैंने निद्रा को अपने बाणों से बेध दिया था॥
निद्रा ने हारकर स्वीकार किया कि वह चौदह साल तक मुझे स्पर्श नहीं करेगी लेकिन जब श्रीराम का अयोध्या में राज्याभिषेक हो रहा होगा और मैं उनके पीछे सेवक की तरह छत्र लिए खड़ा रहूंगा तब वह मुझे घेरेगी ॥ आपको याद होगा
राज्याभिषेक के समय मेरे हाथ से छत्र गिर गया था.
अब मैं 14 साल तक अनाहारी कैसे रहा! मैं जो फल-फूल लाता था आप उसके तीन भाग करते थे. एक भाग देकर आप मुझसे कहते थे लक्ष्मण फल रख लो॥ आपने कभी फल खाने को नहीं कहा- फिर बिना आपकी आज्ञा के मैं उसे खाता कैसे?
मैंने उन्हें संभाल कर रख दिया॥
सभी फल उसी कुटिया में अभी भी रखे होंगे ॥ प्रभु के आदेश पर लक्ष्मणजी चित्रकूट की कुटिया में से वे सारे फलों की टोकरी लेकर आए और दरबार में रख दिया॥ फलों की
गिनती हुई, सात दिन के हिस्से के फल नहीं थे॥
प्रभु ने कहा-
इसका अर्थ है कि तुमने सात दिन तो आहार लिया था?
लक्ष्मणजी ने सात फल कम होने के बारे बताया- उन सात दिनों में फल आए ही नहीं,
1. जिस दिन हमें पिताश्री के स्वर्गवासी होने की सूचना मिली, हम निराहारी रहे॥
2. जिस दिन रावण ने माता का हरण किया उस दिन फल लाने कौन जाता॥
3. जिस दिन समुद्र की साधना कर आप उससे राह मांग रहे थे,
4. जिस दिन आप इंद्रजीत के नागपाश में बंधकर दिनभर अचेत रहे,
5. जिस दिन इंद्रजीत ने मायावी सीता को काटा था और हम शोक में
रहे,
6. जिस दिन रावण ने मुझे शक्ति मारी
7. और जिस दिन आपने रावण-वध किया ॥
इन दिनों में हमें भोजन की सुध कहां थी॥ विश्वामित्र मुनि से मैंने एक अतिरिक्त विद्या का ज्ञान लिया था- बिना आहार किए जीने की विद्या. उसके प्रयोग से मैं चौदह साल तक अपनी भूख को नियंत्रित कर सका जिससे इंद्रजीत मारा गया ॥
भगवान श्रीराम ने लक्ष्मणजी की तपस्या के बारे में सुनकर उन्हें ह्रदय से लगा लिया.

5>   क्या हैं "भगवान राम"..??

रावण सीता को समझा समझा कर हार गया था पर सीता ने रावण की तरफ एक बार देखा तक नहीं,
तब मंदोदरी ने उपाय बताया कि आप #राम बन के सीता के पास जाओ वो आपको जरूर देखेगी..
रावण ने कहा - मैं ऐसा कई बार कर चुका हूँ
मंदोदरी - तब क्या सीता ने आपकी ओर देखा?
रावण - मैं खुद सीता को नहीं देख सका  "क्योंकि मैं जब-जब राम बनता हूँ मुझे परायी
नारी अपनी #माता और  अपनी #पुत्री सी दिखती है।"
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6>जब श्रीरामचन्द्र जी को कुत्ते ने बताया न्याय का अनोखा तरीका

Shri Ram and a Dog Hindi Story from Ramayan : श्रीरामचन्द्र जी वनवास के बाद अयोध्या लौटे तो खूब धूम-धाम से उनका राजतिलक हुआ। बड़े सम्मान के साथ उन्हें अयोध्या का राजा बनाया गया। राज गद्दी पर बैठने के बाद उन्होंने लक्ष्मण जी को आदेश दिया हुआ था कि भोजन करने से पहले देखो हमारे द्वार पर कोई भूखा तो नहीं है।एक दिन की बात है लक्ष्मण जी ने श्रीरामचन्द्र जी से कहा,’ मैं अभी आवाज लगाकर आया हूं, कोई भी भूखा नहीं है।’


श्रीरामचन्द्र जी ने कहा, ‘ दोबारा जाओ और जोर से आवाज लगाओ शायद कोई भूखा रह गया हो। ‘

श्रीरामचन्द्र जी का आदेश पालन करते हुए लक्ष्मण जी दोबारा बाहर गए और उन्होंने जोर से आवाज लगाई तो कोई आदमी तो नहीं वरन् एक कुत्ते को लक्ष्मण जी ने रोते हुए देखा। अन्दर आ कर उन्होंने श्रीरामचन्द्र जी से कहा, ‘बाहर कोई व्यक्ति भूखा नहीं है बल्कि एक कुत्ता अवश्य रो रहा है। ‘

श्रीरामचन्द्र जी ने उस कुत्ते को अंदर बुलाया और कुत्ते से पूछा, ‘ तुम रो क्यों रहे हो ? ‘

कुत्ते ने कहा, ‘एक ब्राह्मण ने मुझे डंडा मारा है।’

श्रीरामचन्द्र जी ने ब्राह्मण को बुलवाया और उससे पूछा, ‘क्या यह कुत्ता सही बोल रहा है? ‘

ब्राह्मण ने कहा, ‘हां यह मेरे रास्ते में सो रहा था इसलिए मैंने इसे डंडा मारा है। यह कुत्ते जहां-तहां लेट जाते हैं, इन्हें डंडे से ही मारना चाहिए।

श्रीरामचन्द्र जी समझ गए कि ब्राह्मण की ही गलती है परंतु ब्राह्मण को क्या कहें सो उन्होंने कुत्ते को पूछा, ‘ब्राह्मण ने तुम्हें डंडा मारा तो तुम क्या चाहते हो? ‘

कुत्ते ने कहा,’भगवान इसे मठाधीश बना दिया जाए।’

कुत्ते की बात सुनकर भगवान मुस्करा दिए और मुस्कराते हुए कुत्ते से पूछा,’ इस ब्राह्मण ने तुम्हें डंडा मारा बदले में तुम इन्हें मठाधीश बनाना चाहते हो। मठाधीश बनने से इनकी बहुत सेवा होगी, काफी चेले बन जाएंगे। इससे तुम्हारा क्या फायदा होगा।’

कुत्ता बोला, मैं भी मठाधीश था। मुझ से कुछ गलत काम हुआ आज मैं कुत्ते की योनि में हूं और लोगों के डंडे खा रहा हूं। ये भी मठाधीश बनेगा फिर कुत्ते की योनि में जाएगा, फिर लोगों के डंडे खाएगा तो इसकी सजा पूरी हो जाएगी।

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7>क्यों कर लिया सीताजी ने हनुमानजी की बातों पर विश्वास?


रामायण में अब तक आपने पढ़ा...यह सुनकर वे सभी राक्षसियां डर गई और जानकी के चरणों में गिर पड़ी। इसके बाद वे सब जहां तहां चली गई। सीताजी मन में सोचने लगी एक महीना बीतने के बाद यह नीच रावण मुझे मारेगा। सीताजी हाथ जोड़कर त्रिजटा से बोली तू मेरी विपत्ति की साथी है। जल्दी कोई ऐसा उपाय कर जिससे मैं शरीर छोड़ सकूं। अब यह सब नहीं सहा जाता अब आगे....
सीताजी के वचन सुनकर त्रिजटा ने चरण पकड़कर उन्हें समझाया। उसके बाद त्रिजटा वहां से चली गई। सीताजी को व्याकुल देखकर हनुमानजी ने अपने मन ही मन कुछ विचार किया और अंगूठी सीताजी के सामने डाल दी। अंगूठी को पहचानकर सीताजी को आश्चर्यचकित होकर उसे देखने लगी। उन्हें कौन जीत सकता है? और माया से ऐसी अंगूठी बनाई जा सकती है। जैसे कई सवाल सीताजी के मन में घूमने लगे। तभी पेड़ पर बैठे हनुमानजी कथा सुनाने लगे। सीताजी मन में अनेक तक प्रकार के विचार कर रही थी। सीताजी का दुख भाग गया।
वे कान और मन लगाकर उन्हें सुनने लगी। हनुमानजी ने सारी कथा कह सुनाई। माता सीता बोली कौन है वो? जिसने कानों के लिए अमृतरूप सुंदर कथा कही, तब हनुमानजी पास चले गए उन्हें देखकर सीताजी मुंह फेरकर बैठ गई। श्रीरामजी का दूत हूं। रामजी की सच्ची कसम खाता हूं। मुझे श्रीरामजी ने यह अंगूठी पहचान के लिए दी है। हनुमानजी की पूरी बात सुनकर सीताजी के मन में विश्वास हो गया कि हनुमानजी श्रीरामजी के ही दूत हैं। यह अंगूठी मैं ही लाया हूं।
सीताजी ने पूछा नर और वानर का संग कहो कैसे हुआ? तब हनुमानजी ने जैसे संग हुआ वह सब कथा सुनाई। हनुमानजी की बात सुनकर सीताजी के मन में विश्वास हो गया। भगवान का सेवक जानकर हनुमानजी से उन्हें अत्यंत गाढ़ी प्रीति हो गई। तब सीताजी ने कहा अब छोटे भाई लक्ष्मणसहित रामजी की कुशल सुनाओ। हनुमान ने कहा अब धीरज धरकर रघुनाथजी का संदेश सुनिए। हनुमानजी ने सीताजी को रामजी का संदेश सुनाया। जब सीताजी के मन में पूरी तरह विश्वास हो गया तो हनुमानजी फिर छोटा रूप धारण कर लिया।

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8>रावण का होगा सर्वनाश, त्रिजटा ने कर दी थी भविष्यवाणी क्योंकि....

 रामायण में अब तक आपने पढ़ा....रावण वहां आया। उस दुष्ट ने सीताजी को बहुत प्रकार से समझाया। उसने कहा मैं मंदोदरी आदि सभी रानियों को तुम्हारी दासी बना दूंगा, यह मेरा प्रण है। तुम एक बार मेरी ओर देखो तो सही! तब सीताजी ने तिनके की आड़ करके कहने लगी। अरे दुष्ट तू समझ ले! तुझे रघुवीर के बाण की खबर नहीं है, यह सुनकर रावण सीताजी को मारने दौड़ा। तब मंदोदरी ने नीति कहकर उसे समझाया अब आगे....
रावण बोला अगर महीनेभर में तुमने कहा न माना तो मैं इस तलवार से तुम्हे मार डालूंगा। उसके बाद रावण वहां से चला गया। राक्षसियों का समूह बहुत से बुरे रूप धरकर सीताजी को भय दिखलाने लगे। उनमें एक त्रिजटा नाम की राक्षसी थी। उसने सब को बुलाकर अपना स्वप्र सुनाया। उसने सभी से कहा तुम सीताजी की सेवा करके अपना कल्याण कर लो। सपने में मैंने देखा एक बंदर ने लंका जला दी। राक्षसों की सारी सेना मार डाली। रावण नंगा है, गधे पर सवार है।
उसका सिर मुड़ा है, बीसों भुजाएं कटी हुई हैं। इस तरह वह दक्षिण दिशा को जा रहा है व लंका का राजा विभीषण बन गया है। मैं कह सकती हूं कि यह स्वप्न सत्य होकर रहेगा। यह सुनकर वे सभी राक्षसियां डर गई और जानकी के चरणों में गिर पड़ी। इसके बाद वे सब जहां तहां चली गई। सीताजी मन में सोचने लगी एक महीना बीतने के बाद यह नीच रावण मुझे मारेगा। सीताजी हाथ जोड़कर त्रिजटा से बोली तू मेरी विपत्ति की साथी है। जल्दी कोई ऐसा उपाय कर जिससे मैं शरीर छोड़ सकूं। अब यह सब नहीं सहा जाता।
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